मंगलवार, 29 मार्च 2016

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मराठा प्रशासन




केंद्रीय प्रशासन:
इसकी स्थापना शिवाजी द्वारा समर्थ प्रशासनिक प्रणाली हेतु की गयी थी जोकि मुख्यतः दक्कन की प्रशासनिक शैली से प्रेरित था. अधिकतर प्रशासनिक सुधारों की प्रेरणा अहमदनगर में मालिक अम्बर द्वारा किये प्रशासनिक सुधारों से मिली थी.
राजा सर्वोच्च पदाधिकारी था जिसकी सहायता ‘अष्टप्रधान’ नाम से जाना जाने वाला आठ मंत्रियों का समूह करता था.

अष्टप्रधान
पेशवा या प्रधानमंत्री-यह सामान्य प्रशासन की देख-रेख करता था.
अमात्य या मजूमदार-यह लेखा प्रमुख था जो बाद में राजस्व एवं वित्त मंत्री बन गया.
सचिव या शुरु-नवीस- इसे चिटनिस भी कहा जाता था और ये राजकीय पत्राचार का कार्य देखता था.
सुमंत या दबीर- यह राजकीय समारोहों और विदेश मामलों का प्रमुख मंत्री था.
सेनापति या सर-ए-नौबत- यह सेना प्रमुख था जो सैन्य भर्ती,प्रशिक्षण एवं अनुशासन की देख-रेख करता था.
मंत्री या वाकिया-नवीस- यह आसूचना,राजा की निजी सुरक्षा एवं अन्य गृह-कार्यों का प्रमुख था.
न्यायाधीश- यह न्याय प्रशासन का प्रमुख था.
पंडितराव- यह राज्य के धर्मार्थ एवं धार्मिक कार्यों का प्रमुख था और जनता के नैतिक उत्थान के लिए कार्य करता था.
पेशवा,मंत्री एवं सचिव नाम के तीन मंत्रियों को अपने विभागीय दायित्वों के अतिरिक्त बड़े प्रान्तों के प्रभारी का दायित्व भी सौंपा जाता था.
न्यायाधीश और पंडितराव को छोड़कर बाकि सभी मंत्रियों को अपने असैनिक दायित्वों के अतिरिक्त सैनिक कमान भी संभाली होती थी.

मंत्री को निम्नलिखित आठ मुंशियों/लिपिकों द्वारा सहयोग प्रदान किया जाता था-

दीवान- सचिव.

मजुमदार- लेखा परीक्षक एवंलेखाकार.

फडनीस- उप-लेखा परीक्षक.

सबनीस या दफ्तरदार- दफ्तर का प्रमुख.

चिटनिस- पत्राचार लिपिक.

जामदार- कोषाधिकारी.

पोतनीस- रोकड़ अधिकारी.

कारखानीस- प्रतिनिधि.
शिवाजी ने अपने संपूर्ण राज्य को चार प्रान्तों में विभक्त किया और प्रत्येक प्रान्त एक राज-प्रतिनिधि(वायसराय) के अधीन होता था.उसने प्रान्तों(सूबों) को पुनः परगनों और तालुकों में विभक्त किया.परगनों के अंतर्गत तरफ और मौजे आते थे.प्रशासन की सबसे छोटी इकाई ग्राम होती थी जिसका मुखिया पाटिल(पटेल) होता था.

राजस्व प्रशासन:
शिवाजी ने जमींदारी प्रणाली को समाप्त कर दिया और उसकी जगह रैय्यतवारी प्रणाली लागू की और देशमुख,देशपांडे,पाटिल और कुलकर्णी नाम से प्रसिद्ध वंशानुगत राजस्व कर्मचारियों की स्थिति में परिवर्तन किया.
शिवाजी ने मिरासदारों,जिनके पास भूमि के वंशानुगत अधिकार थे,पर कड़ी निगरानी रखी.
राजस्व प्रणाली मालिक अम्बर की काठी प्रणाली पर आधारित थी.इस प्रणाली के अनुसार, भूमि के प्रत्येक भाग की माप छड़ी या काठी से की जाती थी.
चौथ और सरदेशमुखी उनकी आय के अन्य स्रोत थे. चौथ कुल राजस्व का चौथाई भाग था जिसे गैर-मराठा क्षेत्रों से ,मराठा आक्रमण से बचने के एवज में, मराठों द्वारा वसूला जाता था.सरदेशमुखी एक अतिरिक्त कर था जो आय का दस प्रतिशत होता था और राज्य से बाहर स्थित क्षेत्रों से वसूला जाता था.

सैन्य प्रशासन:
शिवाजी ने एक अनुशासित और कुशल सेना तैयार की.सामान्य सैनिकों को नकद भुगतान किया जाता था ,लेकिन बड़े-बड़े सरदारों और सेनापति को भुगतान जागीर अनुदान(सरंजाम या मोकासा) के रूप में किया जाता था.
सेना में पैदल सेना (जैसे-मावली सैनिक), घुड़सवार (जैसे-बारगीर एवं सिलेदार),साजो-सामान ढोनें वाले और नौसेना शामिल थी.

सैन्य अधिकारी/कर्मचारी

सर-ए-नौबत(सेनापति)- सेना प्रमुख

किलादार- किलों का अधिकारी

पायक- पैदल सैनिक

नायक- पैदल सेना की एक टुकड़ी का प्रमुख

हवलदार- पांच नायकों का प्रमुख

जुमलादार- पांच हवलदारों का प्रमुख.

घुराव- बंदूकों से लदी नाव

गल्लिवत- 40-50 खेवैयों द्वारा खेने वाली नाव
मराठा राज्य ,जहाँ त्वरित सैन्य अभियान महत्वपूर्ण थे, की नीतियों के निर्धारण में सेना एक प्रभावी उपकरण थी. केवल वर्षा ऋतु में सेना आराम करती थी अन्यथा पूरे साल अभियानों में व्यस्त रहती थी.
पिंडारियों को सेना के साथ जाने की अनुमति थी जिन्हें “पाल-पट्टी”,जोकि युद्ध में लुटे गए माल का 25 प्रतिशत थी ,को वसूलने की अनुमति प्रदान की गयी थी .

निष्कर्ष:

मराठों की प्रशासनिक प्रणाली बहुत हद तक दक्कन राज्यों के प्रशासनिक व्यवहारों से प्रभावित थी.फिर भी मराठों का अपने समकालीन राज्यों ,विशेष रूप से बीजापुर और अहमदनगर, के संदर्भ में प्रशासनिक एवं सैन्य प्रणाली की दृष्टि से महत्वपूर्ण स्थान था.





























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