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शुक्रवार, 6 दिसंबर 2019

भारत का इतिहास पाषाण काल


भारत का इतिहासपाषाण युग- 70000 से 3300 ई.पू
मेहरगढ़ संस्कृति 7000-3300 ई.पू
सिन्धु घाटी सभ्यता- 3300-1700 ई.पू
हड़प्पा संस्कृति 1700-1300 ई.पू
वैदिक काल- 1500–500 ई.पू
प्राचीन भारत - 1200 ई.पू–240 ई.
महाजनपद 700–300 ई.पू
मगध साम्राज्य 545–320 ई.पू
सातवाहन साम्राज्य 230 ई.पू-199 ई.
मौर्य साम्राज्य 321–184 ई.पू
शुंग साम्राज्य 184–123 ई.पू
शक साम्राज्य 123 ई.पू–200 ई.
कुषाण साम्राज्य 60–240 ई.
पूर्व मध्यकालीन भारत- 240 ई.पू– 800 ई.
चोल साम्राज्य 250 ई.पू- 1070 ई.
गुप्त साम्राज्य 280–550 ई.
पाल साम्राज्य 750–1174 ई.
प्रतिहार साम्राज्य 830–963 ई.
राजपूत काल 900–1162 ई.
मध्यकालीन भारत- 500 ई.– 1761 ई.
दिल्ली सल्तनतग़ुलाम वंशख़िलजी वंशतुग़लक़ वंशसैय्यद वंशलोदी वंशमुग़ल साम्राज्य 1206–1526 ई.1206-1290 ई.1290-1320 ई.1320-1414 ई.1414-1451 ई.1451-1526 ई.1526–1857 ई.
दक्कन सल्तनतबहमनी वंशनिज़ामशाही वंश 1490–1596 ई.1358-1518 ई.1490-1565 ई.
दक्षिणी साम्राज्यराष्ट्रकूट वंशहोयसल साम्राज्यककातिया साम्राज्यविजयनगर साम्राज्य 1040-1565 ई.736-973 ई.1040–1346 ई.1083-1323 ई.1326-1565 ई.
आधुनिक भारत- 1762–1947 ई.
मराठा साम्राज्य 1674-1818 ई.
सिख राज्यसंघ 1716-1849 ई.
औपनिवेश काल 1760-1947 ई.


समस्त इतिहास को तीन कालों में विभाजित किया जा एकता है-
प्राक्इतिहास या प्रागैतिहासिक काल Prehistoric Age
आद्य ऐतिहासिक काल Proto-historic Age
ऐतिहासिक काल Historic Age
प्राक् इतिहास या प्रागैतिहासिक काल
मुख्य लेख : प्रागैतिहासिक काल

इस काल में मनुष्य ने घटनाओं का कोई लिखित विवरण नहीं रखा। इस काल में विषय में जो भी जानकारी मिलती है वह पाषाण के उपकरणों, मिट्टी के बर्तनों, खिलौने आदि से प्राप्त होती है।
आद्य ऐतिहासिक काल

इस काल में लेखन कला के प्रचलन के बाद भी उपलब्ध लेख पढ़े नहीं जा सके हैं।
ऐतिहासिक काल

मानव विकास के उस काल को इतिहास कहा जाता है, जिसके लिए लिखित विवरण उपलब्ध है। मनुष्य की कहानी आज से लगभग दस लाख वर्ष पूर्व प्रारम्भ होती है, पर ‘ज्ञानी मानव‘ होमो सैपियंस Homo sapiens का प्रवेश इस धरती पर आज से क़रीब तीस या चालीस हज़ार वर्ष पहले ही हुआ।
पाषाण काल

यह काल मनुष्य की सभ्यता का प्रारम्भिक काल माना जाता है। इस काल को तीन भागों में विभाजित किया जा सकता है। -
पुरा पाषाण काल Paleolithic Age
मध्य पाषाण काल Mesolithic Age एवं
नव पाषाण काल अथवा उत्तर पाषाण काल Neolithic Age
पुरापाषाण काल

यूनानी भाषा में Palaios प्राचीन एवं Lithos पाषाण के अर्थ में प्रयुक्त होता था। इन्हीं शब्दों के आधार पर Paleolithic Age(पाषाणकाल) शब्द बना । यह काल आखेटक एवं खाद्य-संग्रहण काल के रूप में भी जाना जाता है। अभी तक भारत में पुरा पाषाणकालीन मनुष्य के अवशेष कहीं से भी नहीं मिल पाये हैं, जो कुछ भी अवशेष के रूप में मिला है, वह है उस समय प्रयोग में लाये जाने वाले पत्थर के उपकरण। प्राप्त उपकरणों के आधार पर यह अनुमान लगाया जा रहा है कि ये लगभग 2,50,000 ई.पू. के होंगे। अभी हाल में महाराष्ट्र के 'बोरी' नामक स्थान खुदाई में मिले अवशेषों से ऐसा अनुमान लगाया जा रहा है कि इस पृथ्वी पर 'मनुष्य' की उपस्थिति लगभग 14 लाख वर्ष पुरानी है। गोल पत्थरों से बनाये गये प्रस्तर उपकरण मुख्य रूप से सोहन नदी घाटी में मिलते हैं।

सामान्य पत्थरों के कोर तथा फ़्लॅक्स प्रणाली द्वारा बनाये गये औजार मुख्य रूप से मद्रास, वर्तमान चेन्नई में पाये गये हैं। इन दोनों प्रणालियों से निर्मित प्रस्तर के औजार सिंगरौली घाटी, मिर्ज़ापुर एंवं बेलन घाटी, इलाहाबाद में मिले हैं। मध्य प्रदेश के भोपालनगर के पास भीम बेटका में मिली पर्वत गुफायें एवं शैलाश्रृय भी महत्त्वपूर्ण हैं। इस समय के मनुष्यों का जीवन पूर्णरूप से शिकार पर निर्भर था। वे अग्नि के प्रयोग से अनभिज्ञ थे। सम्भवतः इस समय के मनुष्य नीग्रेटो Negreto जाति के थे। भारत में पुरापाषाण युग को औजार-प्रौद्योगिकी के आधार पर तीन अवस्थाओं में बांटा जा एकता हैं। यह अवस्थाएं हैं-
पुरापाषाण कालीन संस्कृतियांकालअवस्थाएं
1- निम्न पुरापाषाण काल हस्तकुठार Hand-axe और विदारणी Cleaver उद्योग
2- मध्य पुरापाषाण काल

शल्क (फ़्लॅक्स) से बने औज़ार
3- उच्च पुरापाषाण काल

शल्कों और फ़लकों (ब्लेड) पर बने औजार

पूर्व पुरापाषाण काल के महत्त्वपूर्ण स्थल हैं -
पूर्व पुरापाषाण काल के महत्त्वपूर्ण स्थलस्थलक्षेत्र
1- पहलगाम कश्मीर
2- वेनलघाटी

इलाहाबाद ज़िले में, उत्तर प्रदेश
3- भीमबेटका और आदमगढ़

होशंगाबाद ज़िले में मध्य प्रदेश
4- 16 आर और सिंगी तालाब

नागौर ज़िले में, राजस्थान
5- नेवासा

अहमदनगर ज़िले में महाराष्ट्र
6- हुंसगी

गुलबर्गा ज़िले में कर्नाटक
7- अट्टिरामपक्कम

तमिलनाडु

मध्य पुरापाषाण युग के महत्त्वपूर्ण स्थल हैं -
भीमबेटका
नेवासा
पुष्कर
ऊपरी सिंध की रोहिरी पहाड़ियाँ
नर्मदा के किनारे स्थित समानापुर
पुरापाषाण काल में प्रयुक्त होने वाले प्रस्तर उपकरणों के आकार एवं जलवायु में होने वाले परिवर्तन के आधार पर इस काल को हम तीन वर्गो में विभाजित कर सकते हैं।-
निम्न पुरा पाषाण काल (2,50,000-1,00,000 ई.पू.)
मध्य पुरापाषाण काल (1,00,000- 40,000 ई.पू.)
उच्च पुरापाषाण काल (40,000- 10,000 ई.पू.)
मध्य पाषाण काल

इस काल में प्रयुक्त होने वाले उपकरण आकार में बहुत छोटे होते थे, जिन्हें लघु पाषाणोपकरण माइक्रोलिथ कहते थे। पुरापाषाण काल में प्रयुक्त होने वाले कच्चे पदार्थ क्वार्टजाइट के स्थान पर मध्य पाषाण काल में जेस्पर, एगेट, चर्ट और चालसिडनी जैसे पदार्थ प्रयुक्त किये गये। इस समय के प्रस्तर उपकरण राजस्थान, मालवा, गुजरात, पश्चिम बंगाल, उड़ीसा, आंध्र प्रदेशएवं मैसूर में पाये गये हैं। अभी हाल में ही कुछ अवशेष मिर्जापुर के सिंगरौली, बांदा एवं विन्ध्य क्षेत्र से भी प्राप्त हुए हैं। मध्य पाषाणकालीन मानव अस्थि-पंजर के कुछ अवशेष प्रतापगढ़,उत्तर प्रदेश के सराय नाहर राय तथा महदहा नामक स्थान से प्राप्त हुए हैं। मध्य पाषाणकालीन जीवन भी शिकार पर अधिक निर्भर था। इस समय तक लोग पशुओं में गाय, बैल, भेड़, घोड़े एवं भैंसों का शिकार करने लगे थे।

जीवित व्यक्ति के अपरिवर्तित जैविक गुणसूत्रों के प्रमाणों के आधार पर भारत में मानव का सबसे पहला प्रमाण केरल से मिला है जो सत्तर हज़ार साल पुराना होने की संभावना है। इस व्यक्ति के गुणसूत्र अफ़्रीक़ा के प्राचीन मानव के जैविक गुणसूत्रों (जीन्स) से पूरी तरह मिलते हैं।[1] यह काल वह है जब अफ़्रीक़ा से आदि मानव ने विश्व के अनेक हिस्सों में बसना प्रारम्भ किया जो पचास से सत्तर हज़ार साल पहले का माना जाता है। कृषि संबंधी प्रथम साक्ष्य 'साम्भर' राजस्थान में पौधे बोने का है जो ईसा से सात हज़ार वर्ष पुराना है। 3000 ई. पूर्व तथा 1500 ई. पूर्व के बीच सिंधु घाटी में एक उन्नत सभ्यता वर्तमान थी, जिसके अवशेष मोहन जोदड़ो (मुअन-जो-दाड़ो) और हड़प्पा में मिले हैं। विश्वास किया जाता है कि भारत में आर्यों का प्रवेश बाद में हुआ। वेदों में हमें उस काल की सभ्यता की एक झाँकी मिलती है।

मध्य पाषाण काल के अन्तिम चरण में कुछ साक्ष्यों के आधार पर प्रतीत होता है कि लोग कृषि एवं पशुपालन की ओर आकर्षित हो रहे थे इस समय मिली समाधियों से स्पष्ट होता है कि लोग अन्त्येष्टि क्रिया से परिचित थे। मानव अस्थिपंजर के साथ कहीं-कहीं पर कुत्ते के अस्थिपंजर भी मिले है जिनसे प्रतीत होता है कि ये लोग मनुष्य के प्राचीन काल से ही सहचर थे।

बागोर और आदमगढ़ में छठी शताब्दी ई.पू. के आस-पास मध्य पाषाण युगीन लोगों द्वारा भेड़े, बकरियाँ रख जाने का साक्ष्य मिलता है। मध्य पाषाण युगीन संस्कृति के महत्त्वपूर्ण स्थल हैं -
मध्य पाषाण युगीन संस्कृति के महत्त्वपूर्ण स्थलस्थलक्षेत्र
1- बागोर राजस्थान
2- लंघनाज

गुजरात
3- सराय नाहरराय, चोपनी माण्डो, महगड़ा व दमदमा

उत्तर प्रदेश
4- भीमबेटका, आदमगढ़

मध्य प्रदेश

नव पाषाण अथवा उत्तर पाषाण काल
मुख्य लेख : नव पाषाण काल

साधरणतया इस काल की सीमा 3500 ई.पू. से 1000 ई.पू. के बीच मानी जाती है। यूनानी भाषा का Neo शब्द नवीन के अर्थ में प्रयुक्त होता है। इसलिए इस काल को ‘नवपाषाण काल‘ भी कहा जाता है। इस काल की सभ्यता भारत के विशाल क्षेत्र में फैली हुई थी। सर्वप्रथम 1860 ई. में 'ली मेसुरियर' Le Mesurier ने इस काल का प्रथम प्रस्तर उपकरण उत्तर प्रदेश कीटौंस नदी की घाटी से प्राप्त किया। इसके बाद 1872 ई. में 'निबलियन फ़्रेज़र' ने कर्नाटक के 'बेलारी' क्षेत्र को दक्षिण भारत के उत्तर-पाषाण कालीन सभ्यता का मुख्य स्थल घोषित किया। इसके अतिरिक्त इस सभ्यता के मुख्य केन्द्र बिन्दु हैं - कश्मीर, सिंध प्रदेश, बिहार, झारखंड, बंगाल, उत्तर प्रदेश, आंध्र प्रदेश, छत्तीसगढ़, असम आदि।
ताम्र-पाषाणिक काल

जिस काल में मनुष्य ने पत्थर और तांबे के औज़ारों का साथ-साथ प्रयोग किया, उस काल को 'ताम्र-पाषाणिक काल' कहते हैं। सर्वप्रथम जिस धातु को औज़ारों में प्रयुक्त किया गया वह थी - 'तांबा'। ऐसा माना जाता है कि तांबे का सर्वप्रथम प्रयोग क़रीब 5000 ई.पू. में किया गया। भारत में ताम्र पाषाण अवस्था के मुख्य क्षेत्र दक्षिण-पूर्वी राजस्थान, मध्य प्रदेश के पश्चिमी भाग, पश्चिमी महाराष्ट्र तथा दक्षिण-पूर्वी भारत में हैं। दक्षिण-पूर्वी राजस्थान में स्थित 'बनास घाटी' के सूखे क्षेत्रों में 'अहाड़ा' एवं 'गिलुंड' नामक स्थानों की खुदाई की गयी। मालवा, एवं 'एरण' स्थानों पर भी खुदाई का कार्य सम्पन्न हुआ जो पश्चिमी मध्य प्रदेश में स्थित है। खुदाई में मालवा से प्राप्त होनेवाले 'मृद्भांड' ताम्रपाषाण काल की खुदाई से प्राप्त अन्य मृद्भांडों में सर्वात्तम माने गये हैं।

पश्चिमी महाराष्ट्र में हुए व्यापक उत्खनन क्षेत्रों में अहमदनगर के जोर्वे, नेवासा एवं दायमाबाद, पुणे ज़िले में सोनगांव, इनामगांव आदि क्षेत्र सम्मिलित हैं। ये सभी क्षेत्र ‘जोर्वे संस्कृति‘ के अन्तर्गत आते हैं। इस संस्कृति का समय 1,400-700 ई.पू. के क़रीब माना जाता है। वैसे तो यह सभ्यता ग्रामीण भी पर कुछ भागों जैसे 'दायमाबाद' एवं 'इनामगांव' में नगरीकरण की प्रक्रिया प्रारम्भ हो गयी थी। 'बनासघाटी' में स्थित 'अहाड़' में सपाट कुल्हाड़ियां, चूड़ियां और कई तरह की चादरें प्राप्त हुई हैं। ये सब तांबे से निर्मित उपकरण थे। 'अहाड़' अथवा 'ताम्बवली' के लोग पहले से ही धातुओं के विषय में जानकारी रखते थे। अहाड़ संस्कृति की समय सीमा 2,100 से 1,500 ई.पू. के मध्य मानी जाती है। 'गिलुन्डु', जहां पर एक प्रस्तर फलक उद्योग के अवशेष मिले हैं, 'अहाड़ संस्कृति' का केन्द्र बिन्दु माना जाता है।

इस काल में लोग गेहूँ, धान और दाल की खेती करते थे। पशुओं में ये गाय, भैंस, भेड़, बकरी, सूअर और ऊँट पालते थे। 'जोर्वे संस्कृति' के अन्तर्गत एक पांच कमरों वाले मकान का अवशेष मिला है। जीवन सामान्यतः ग्रामीण था। चाक निर्मित लाल और काले रंग के 'मृद्‌भांड' पाये गये हैं। कुछ बर्तन, जैसे 'साधारण तश्तरियां' एवं 'साधारण कटोरे' महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश में 'सूत एवं रेशम के धागे' तथा 'कायथा' में मिले 'मनके के हार' के आधार पर कहा जा एकता है कि 'ताम्र-पाषाण काल' में लोग कताई-बुनाई एवं सोनारी व्यवसाय से परिचित थे। इस समय शवों के संस्कार में घर के भीतर ही शवों का दफ़ना दिया जाता था। दक्षिण भारत में प्राप्त शवों के शीश पूर्व और पैर पश्चिम की ओर एवं महाराष्ट्र में प्राप्त शवों के शीश उत्तर की ओर एवं पैर दक्षिण की ओर मिले हैं। पश्चिमी भारत में लगभग सम्पूर्ण शवाधान एवं पूर्वी भारत में आंशिक शवाधान का प्रचलन था।

इस काल के लोग लेखन कला से अनभिज्ञ थे। राजस्थान और मालवा में प्राप्त मिट्टी निर्मित वृषभ की मूर्ति एवं 'इनाम गांव से प्राप्त 'मातृदेवी की मूर्ति' से लगता है कि लोग वृषभ एवं मातृदेवी की पूजा करते थे। तिथि क्रम के अनुसार भारत में ताम्र-पाषाण बस्तियों की अनेक शाखायें हैं। कुछ तो 'प्राक् हड़प्पायी' हैं, कुछ हड़प्पा संस्कृति के समकालीन हैं, कुछ और हड़प्पोत्तर काल की हैं। 'प्राक् हड़प्पा कालीन संस्कृति' के अन्तर्गत राजस्थान के 'कालीबंगा' एवं हरियाणा के 'बनवाली' स्पष्टतः ताम्र-पाषाणिक अवस्था के हैं। 1,200 ई.पू. के लगभग 'ताम्र-पाषाणिक संस्कृति' का लोप हो गया। केवल ‘जोर्वे संस्कृति‘ ही 700 ई.पू. तक बची रह सकी। सर्वप्रथम चित्रित भांडों के अवशेष 'ताम्र-पाषाणिक काल' में ही मिलते हैं। इसी काल के लोगों ने सर्वप्रथम भारतीय प्राय:द्वीप में बड़े बड़े गांवों की स्थापना की।
ताम्र पाषणिक संस्कृतियांसंस्कृतिकाल
1- अहाड़ संस्कृति लगभग 1700-1500 ई.पू.
2- कायथ संस्कृति

लगभग 2000-1800 ई.पू.
3- मालवा संस्कृति

लगभग 1500-1200 ई.पू.
4- सावलदा संस्कृति .

लगभग 2300-2200 ई.पू
5- जोर्वे संस्कृति

लगभग 1400-700 ई.पू.
6- प्रभास संस्कृति

लगभग 1800-1200 ई.पू.
7- रंगपुर संस्कृति

लगभग 1500-1200 ई.पू.



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सोमवार, 20 अगस्त 2018

100 सामान्य विज्ञान प्रश्न


GK Questions Answers

100 सामान्य विज्ञान प्रश्न 





1. 'ट्रिपल एंटीजन' किन तीन रोगों से बचाता है ?
उत्तर - काली खासी, टिटनेस, डिप्थीरिया
2. किस तत्व के कमी के कारण मनुष्य एनीमिया से ग्रसित हो जाते हैं ।
उत्तर - आयरन
3. एटिनील किस लिए प्रयोग में लाया जाता है ?
उत्तर - रक्तचाप घटाने के लिए
4. पित्तरस का कार्य क्या है ?
उत्तर - वसा का एमल्सीकरण
5. 'सिड्स' क्या है ?
उत्तर - घातक मृत्यु रोग
6. ध्वनि की तीव्रता निर्धारित होती है ।
उत्तर - आयाम से
7. अंधो के पढ़ने की लिपि होती है ।
उत्तर - ब्रेल लिपि
8. प्राकृतिक वरण (Natural Selection) का सिद्धान्त किसने दिया ?
उत्तर - चार्ल्स डार्विन
9. रक्त परिवहन तन्त्र की व्याख्या किसने दी ?
उत्तर - हार्वे
10. फाउंटेन पेन का आविष्कारक कौन था ?
उत्तर - वॉटर मैन
11. एल्बो ज्वाइंट (Elbow Joint) किस प्रकार का ज्वाइंट है ?
उत्तर - हिंग ज्वाइंट (Hing Joint)
12. ब्लीचिंग पाउडर का रासायनिक सूत्र क्या है ?
उत्तर - M
13. मूत्र का पीला रंग निम्न में से किसके कारण होता है ?
उत्तर - यूरोक्रोम के कारण
14. सोडियम कार्बोनेट का व्यापारिक नाम है ।
उत्तर - धोने का सोडा
15. जेनेटिक कोड की खोज किसने की ?
उत्तर - हरगोविंद खुराना
16. पीने के पानी में क्लोरीन क्यों मिलाई जाती है ?
उत्तर - क्लोरीन युक्त पानी रोग की कीटाणुओं से मुक्त होता है ।
17. घेंघा रोग किस कमी के कारण होती है ?
उत्तर - आयोडीन की कमी से
18. दूध के दांत किस आयु तक गिर जाते हैं ?
उत्तर - 16 वर्ष तक
19. दूध से दही जमाने में कौन से जीवाणु काम आते हैं ।
उत्तर - लैक्टोवैसिलस जीवाणु
20. किसे भारी जल कहा जाता है ?
उत्तर - ड्यूटोरियम आक्साइड
21. किससे होकर ध्वनि का संचरण नही हो सकता ?
उत्तर - तेल से
22. लार की प्रकृति होती है ।
उत्तर - अम्लीय
23. किस वैज्ञानिक ने नियंत्रित नाभिकीय विखंडन अभिक्रिया की अवधारणा सर्वप्रथम प्रस्तुत की ?
उत्तर - एनरिको फर्मी
24. 'गैल्वेनोमीटर' का उपयोग किसमें किया जाता है ?
उत्तर - विद्युत धारा ज्ञात करने में
25. जल का क्वथनांक अधिक होता है , क्योंकि ?
उत्तर - इसके अनु हाइड्रोजन आबंध से बंधे होते हैं ।
26. जल की अस्थाई कठोरता किसकी उपस्थिति के कारण होती है ?
उत्तर - Ca और Mg के बाइकार्बोनेट
27. उत्प्रेरक एक पदार्थ है, जो
उत्तर - अभिक्रिया की दर बदल देता है ।
28. किसी लेंस की झमता व्यक्त की जाती है ।
उत्तर - डाईआप्टर में
29. किससे परमाणु का निर्माण होता है ।
उत्तर - इलेक्ट्रान, प्रोटान एवं न्युट्रान से
30. कौन सी गैस हवा में सबसे अधिक अनुपात में उपस्थित है ।
उत्तर - नाइट्रोजन
31. जल का हिमांक (Freezing Point) है-
उत्तर - 4° C
32. आद्रता मापने का यन्त्र है ।
उत्तर - हाइग्रोमीटर
33. धारा (Current) की इकाई है ।
उत्तर - एम्पियर
34. सूर्य में सतत ऊर्जा किसके कारण मुक्त होती है ?
उत्तर - नाभिकीय संलयन के कारण
35. किसी सिस्मोग्राफ (Seismograph) का उपयोग क्या मापने के लिए होता है ?
उत्तर - भूकम्प का झटका
36. उबलते पानी की अपेक्षा भाप से अधिक जलन होने का कारण है।
उत्तर - भाप की गुप्त ऊष्मा के कारण
37. कपास के पौधे के किस भाग से कपास का रेशा निकल जाता है ।
उत्तर - कपास के बीज से
38. यकृत (Liver) का क्या कार्य है ?
उत्तर - ग्लूकोज को ग्लुकोजन के रूप में संचित करना
39. किसकी उपस्थिति के कारण पत्तियों का रंग हरा होता है ?
उत्तर - पर्णहरित के कारण

General Knowledge Question Answer

40. भोजन में लोहे की कमी के कारण होता है ।
उत्तर - अरक्तता
41. मानव शरीर में रक्त शुद्ध होता है ।
उत्तर - फेफड़ो में
42. किसी वयस्क व्यक्ति के हृदय की धड़कन लगभग होती है ।
उत्तर - 72 बार प्रति मिनट
43. खाने का सोडा (Baking Soda) है ।
उत्तर - NaHCO
45. कार्बन (Carbon) क्या है?
उत्तर - अधातु
46. दांत के डॉ. का दर्पण होता है ।
उत्तर - अवतल
47. ग्रहो को कक्षा में बांधे रखने के वाले बल को कहते है ।
उत्तर - गुरुत्वीय बल
48. ऊष्मा किस प्रक्रिया से सर्वाधिक तीव्र गति से स्थानांतरित होती है ?
उत्तर - विकिरण
49. मीथेन गैस कैसे बनती है ?
उत्तर - सोडियम एसीटेट को सोडा लाइम के साथ गर्म करने पर
50. हीरा और ग्रेफाइट में मुख्य अंतर है ।
उत्तर - चतुष्फल्कीय सरंचना एवं षट्कोणीय संरचना
51. शुल्क सेल में जिंक की सतह पर होती है ।
उत्तर - ऋणात्मक
52. मानव शरीर में कौन-रक्त ग्रुप प्रायः अधिक पाया जाता है ?
उत्तर - B+
53. मशरूम है ।
उत्तर - फंजाई

GK QUIZ
54. स्प्रेक्टम में सबसे ऊपर कौन सा रंग होता है ?
उत्तर - लाल
55. मानव शरीर में कितनी हड्डी होती है?
उत्तर - 206
56. दूध की शुद्धता नापने वाले यन्त्र को क्या कहते है ?
उत्तर - लैक्टोमीटर
57. शुष्क सेल में कैथोड का कार्य करता है।
उत्तर - ग्रेफाइड की छड़
58. यदि अम्ल कि प्रतिक्रिया जिंक के टुकड़े से कराइ जाय, तो कौन सी गैस निकलती है ?
उत्तर - हाइड्रोजन
59. पृथ्वी के क्रष्ट में कौन सा तत्व अधिक मात्रा मे पाया जाता है?
उत्तर - ऑक्सीजन
60. ऑप्टिकल फाइबर होता है ।
उत्तर - कांच का बना हुआ
61. दही का जमना कौन सी प्रतिक्रिया है ?
उत्तर - रासायनिक प्रतिक्रिया
62. गुरुत्वाकर्षण का सिद्धान्त किसने दिया ?
उत्तर - न्यूटन
63. प्रकाश का वेग होता है।
उत्तर - 300000 किमी./सेकण्ड
64. कांच में प्रकाश का वेग होता है।
उत्तर - 2×10 मी./सेकण्ड
65. निकट दृष्टि-दोष में लेंस का प्रयोग होता है।
उत्तर - अवतल लेंस
66. 'सिनेबार' किसका प्रमुख अयस्क है?
उत्तर - पारा
67. 'भूकम्प' किससे मापा जाता है ?
उत्तर- सीस्मोग्राफ
68. निकट वस्तु को नही दिखने पर हुई दोष को कहते है ।
उत्तर - दूर दृष्टि दोष
69. 'निशांधता' (रतौंधी) किसकी कमी के कारण होता है?
उत्तर - विटामिन-ए
70. शरीर में हीमोग्लोबिन का कार्य है ।
उत्तर - ऑक्सीजन परिवहन
71. एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक अनुवांशिक सूचना का स्थानांतरण किसके द्वारा पूरा किया जाता है?
उत्तर - DNA द्वारा
72. किस रोग के प्रतिरोध के लिए बी. सी. जी. का टीका दिया जाता है?
उत्तर - खसरा
73. खाद्य संसाधन तथा सञ्चय द्वारा कौन सा पोषक अधिकांश रूप से प्रभावित होते है?
उत्तर - वसा
74. ग्रह सूर्य के चारो ओर घूमते है । इसका कारण है ।
उत्तर - गुरुत्वाकर्षण बल
75. पेंसिलीन का प्रमुख स्रोत है।
उत्तर - कवक
76. कौन सा रंग क्लोरोफिल द्वारा अवशोषित नही किया जाता है ?
उत्तर - हरा
77. पौधे श्वसन किसके द्वारा करते है?
उत्तर - पत्तियों द्वारा
78. गुब्बारे में कौन सी गैस प्रयुक्त की जाती है?
उत्तर - हीलियम
79. स्त्रियों एवं बच्चों की आवाज तीखी (SHRILLER) होती है । इसका कारण है।
उत्तर - उच्च आवृत्ति
80. यदि लेंस से देखने पर अक्षरों का आकार छोटा दिखाई दे , तो वह लेंस है ।
उत्तर - अवतल
81. किसी वाहन का गति मापक यन्त्र बताता है ।
उत्तर - वाहन की तात्क्षणिक चाल
82. कौन-सा जीव धरी, पौधों और जन्तुओं के बीच की कड़ी के रूप में समझा जाता है?
उत्तर - यूग्लीना
83. एकई समतल दर्पण पर आपाती किरण 60° का कोण बनती है, तो परावर्तन कोण होगा ?
उत्तर - 60°
84. 'प्रकाश वर्ष' किसका मात्रक है?
उत्तर - लम्बाई का मात्रक
85. जब कोई वस्तु (पिंड) एक वृत्त के अनुचर गति से चलती है, तो-
उत्तर - उस पर कोई भी कार्य नही हो रहा होता है
86. पानी के एक बीकर में एक बर्फ का टुकड़ा तैर रहा है । जब बर्फ पिघल जायेगी तो पानी का स्तर -
उत्तर - नीचे जायेगा
87. उच्च तुगन्ता पर पानी कुछ कम तापमान पर उबलने लगता, इसका कारण है-
उत्तर - वायुमंडलीय दाब तुगंता के साथ-साथ घटता है
88. 220 V पर कार्य करते हुए 2KW के हीटर में से गुजरने वाली धारा की संगड़ना होगी ।
उत्तर - 9.0 A
89. पदार्थ (द्रव्य) की अवस्था जहाँ निश्चित आकृत और निश्चित आयतन दोनों से वर्णित हो, तो उसे कहते है ।
उत्तर - ठोस
90. पानी और खड़िया के मिश्रण को किस विधि से पृथक किया जा सकता है ?
उत्तर - अवसादन द्वारा
91. परमाणु में प्रोटान रहते है-
उत्तर - नाभिक के भीतर
92. जंग किसका उदाहरण है-
उत्तर - यौगिक का
93. द्रव बून्द की संकुचन और कम से कम घरने की प्रवृत्ति का कारण-
उत्तर - पृष्ठ तनाव
94. एक आदमी 10 मीटर से अधिक दूर की वस्तु को स्पष्ट नही देख सकता है। वह किस दृष्टिकोण से पीड़ित है?
उत्तर - मायोपिया
95. 'फ्यूज वायर' का कार्य होता है।
उत्तर - प्रबल धारा आने पर पिघल कर विद्युत् परिपथ को भंग कर देना
96. अत्यधिक शीत ऋतु में पहाड़ो पर पानी की पाइप लाइने फट जाती हैं, इसका कारण है।
उत्तर - पाइप में पानी जमने पर फ़ैल जाता है, इस कारण से।
97. धातुएँ सामान्यतया विद्युत् सुचालक होती है । फिर भी विद्युत् चालकता की दृष्टि से सबसे अधिक सुचालक है-
उत्तर - सिल्वर
98. हवा का वाष्प घनत्व कितना होता है?
उत्तर - 14.4
99. एक परमाणु के 19 प्रोटान और 20 न्यूट्रान है , उसकी द्रव्यमान संख्या होगी-
उत्तर - 39
100. घड़ी की चाबी भरने के बाद उसमे कौन सी ऊर्जा संग्रहीत होती है?
उत्तर - यांत्रिकी ऊर्जा






मंगलवार, 10 जुलाई 2018

Gk in Chemistry science






रसायनशास्त्र विज्ञान की वह शाखा है जिसमें पदार्थों के संघटन, संरचना, गुणों और रासायनिक प्रतिक्रिया के दौरान इनमें हुए परिवर्तनों[1] का अध्ययन किया जाता है। इसका शाब्दिक विन्यास रस+अयन है जिसका शाब्दिक अर्थ रसों (द्रवों) का अध्ययन है। यह एक भौतिक विज्ञान है जिसमें पदार्थों केपरमाणुओं, अणुओं, क्रिस्टलों (रवों) और रासायनिक प्रक्रिया के दौरान मुक्त हुए या प्रयुक्त हुए ऊर्जा का अध्ययन किया जाता है।

संक्षेप में रसायन विज्ञान रासायनिक पदार्थों[2] का वैज्ञानिक अध्ययन है। पदार्थों का संघटन परमाणु या उप-परमाण्विक कणों जैसे इलेक्ट्रॉन, प्रोटॉन और न्यूट्रॉन[3] से हुआ है। रसायन विज्ञान को केंद्रीय विज्ञान या आधारभूत विज्ञान भी कहा जाता है क्योंकि यह दूसरे विज्ञानों जैसे, खगोलविज्ञान, भौतिकी, पदार्थ विज्ञान, जीवविज्ञान और भूविज्ञान को जोड़ता है।


दस सर्वाधित प्रयुक्त रसायन

रासायनिक पदार्थउत्पादों की संख्यामात्रा (टनों में)
पानी26,5092,355,650
टाइटेनियम डाईआक्साइड4,46361,790
जाइलीन (Xylene)4,27128,568
2-Methyl-4-isothiazolin-3-one2,95339
आइसोप्रोपेनॉल2,88118,116
ब्यूटिल एसीटेट2,70014,186
1,2-Benzisothiazolin-3-one2,66198
औसत एरोमटिक विलायक नेप्था2,43916,307
एथनॉल (Ethanol)2,368443,912
5-Chloro-2-methyl-4-isothiazolin-3-one2,30032


केमिस्ट्री की शब्दोत्पत्ति - भाषा वैज्ञानिक दृष्टि
भाषा विज्ञान की दृष्टि में केमिस्ट्री की मूल धातु Chemy की व्युत्पत्ति यूनानी भाषा के खीमिया (Khymeia) से हुई है जिसका तात्पर्य है - 'धातु निर्माण की यूनानी तकनीक'।
अन्य मान्यतानुसार केमी का अर्थ - परस्पर एक दूसरे में मिलाना।
केमिस्ट्री की मूल धातु Chemy की समानता चीनी शब्द Kim से है, अर्थात् धातुओं के रूपांतर की कला। इसका एक रूप चिन (Chin) है।
अरबी और ग्रीक में Chemy शब्द वस्तुतः चीनी भाषा के Kim के रूपांतर है। चीनी (मेंडारिन भाषा) में Chimmi शब्द का अर्थ 'सोना गलाना' है।
केमिस्ट्री के अन्तर्गत मोटे तौर पर तत्व और यौगिक के रूपांतरण, निर्माण और उनके गुणधर्मो का अध्ययन किया जाता है।
अन्य मान्यतानुसार केमिस्ट्री स्पेनिश भाषा के अलकेमी (Alchemy) से आया माना जाता है जो अरबी के अल-कीमिया (al-kimia) से बना है जिसका शाब्दिक अर्थ - रूपांतरण है।
यद्यपि केमी शब्द की उत्पत्ति के विभिन्न मत है, परंतु इसके बाद भी यह निश्चित है कि इस शब्द का मूलाधार एक ही है। इससे मिलते-जुलते शब्द पूर्व मध्य एशिया और यूरोप की भाषाओं में मिलते हैं अतः इस तथ्य की पुष्टि होती है।
इसके अतिरिक्त आयुर्वेद में भी 'रसायन' शब्द का बहुतायत से प्रयोग हुआ है। आयुर्वेद में पारा को 'रसराज' यानी रसों का राजा तथा पारे से निर्मित औषधियाँ 'रसायन' कहलाती थीं। रसायन से 'रसशास्त्र' बना है।
रसायन विज्ञान, रसायनों के रहस्यों को समझने की कला है। इस विज्ञान से विदित होता है कि पदार्थ किन-किन चीजों से बने हैं, उनके क्या-क्या गुण हैं और उनमें क्या-क्या परिवर्तन होते हैं।
सभी पदार्थ तत्वों से बने हुए हैं। भारतीय विद्वान दार्शनिकों ने उद्घोषित किया कि पदार्थ की रचना पंच महाभूतों, यथा- आकाश, वायु, जल, तेज तथा पृथ्वी से हुई है। वहीं यूनानी विचारकों के अनुसार पदार्थो की रचना चार प्रकार के तत्वों, यथा - पृथ्वी, वायु, जल तथा अग्नि से हुई है।
यूरोप में रसायन विज्ञान का प्रारंभ 12वीं शताब्दी में थियोफिलस से हुआ।
15वीं-16वीं शताब्दी में पैरासेलस (1493-1541 ई.) ने औषधि रसायन के क्षेत्र में कार्य किया।
16वीं-17वीं शताब्दी में फ्रांसिस बैकन (1561-1636 ई.) ने आधुनिक रसायन विज्ञान की आधारशिला रखी।
भारत में रसायन विज्ञान का इतिहास अत्यन्त प्राचीन है। भारतीयों को हड़प्पा-पूर्व काल (4000 ईसापूर्व) से ही रसायन विज्ञान और रसायन प्रौद्योगिकी का ज्ञान था। इतिहास में भारतीय इस्पात की श्रेष्ठता के कई उल्लेख मिलते है। दिल्ली का लौहस्तंभ तथा बिहार के भागलपुर जिले में स्थित बुद्ध की ताम्र प्रतिमा इसके ज्वंलत उदाहरण है।
रसायन विज्ञान के क्षेत्र

रसायन विज्ञान की भी कई शाखाएं हैं जिन्हें पदार्थों के अध्ययन के दौरान बांटा गया है। रसायन विज्ञान की शाखाओं में कार्बनिक रसायन, अकार्बनिक रसायन, जैव रसायन, भौतिक रसायन, विश्लेषणात्मक रसायनआदि प्रमुख हैं।

कार्बनिक रसायन में कार्बनिक पदार्थों, अकार्बनिक रसायन में अकार्बनिक पदार्थों, जैव रसायन में सुक्ष्म जीवों में उपस्थित पदार्थों, भौतिक रसायन में पदार्थ की बनावट, संघटन और उसमें सन्निहित ऊर्जा, विश्लेषणात्मक रसायन में नमूने के विश्लेषण का अध्ययन किया जाता है ताकि उसकी बनावट और संचरना का पता चले। हाल के दिनों में न्यूरो-रसायन जैसी रसायन की कुछ और शाखाओं का उदय हुआ है।

रसायन विज्ञान का क्षेत्र बहुत व्यापक है तथा दूसरे विज्ञानों के समन्वय से प्रतिदिन विस्तृत होता जा रहा है। फलत: आज हम भौतिक एवं रसायनभौतिकी, जीव रसायन, शरीर-क्रिया-रसायन, सामान्य रसायन, कृषि रसायन, आदि अनेक नवीन उपांगों में रसायन विज्ञान का अध्ययन देखते हैं।

अध्ययन की सुविधा के लिए हम रसायन विज्ञान कई शाखाओं में वर्गीकृत करते हैं-1. अकार्बनिक रसायन2. कार्बनिक रसायन3. भौतिक रसायन3. वैश्लेषिक रसायन4. जीव रसायन5. औद्योगिक रसायन6. औषधीय रसायन7. नाभिकीय रसायन8. कृषि रसायन (Green Chemistry)9. पर्यावरणीय रसायन (Environmental Chemistry)10. हरित रसायन (Green Chemistry)

इनके अलावा भूरसायन, खगोलरसायन, बहुलक रसायन, क्लस्टर रसायन, विद्युत् रसायन, पर्यावरण रसायन, आहार रसायन, सामान्य रसायन, नैनो रसायन, ठोस अवस्था रसायन, ऊष्मारसायन आदि अन्य शाखायें हैं।



रसायन विज्ञान और हमारा जीवन

मानव जीवन को समुन्नत करने में रसायन विज्ञान का अक्षुण्ण योगदान है। मानव जाति के भविष्य को सुरक्षित करने के लिए रसायन विज्ञान का विकास अनिवार्य है। यह तभी संभव होगा जब आमजन इस विज्ञान के प्रति आकर्षित होगा। इस विज्ञान का विवेकपूर्ण उपयोग करना ही समय की मांग है।
सम्पूर्ण ब्रह्मांड रसायनों का विषद् भण्डार है। जिधर भी हमारी दृष्टि जाती है, हमें विविध आकार-प्रकार की वस्तुएं नजर आती हैं। समूचा संसार ही रसायन विज्ञान की प्रयोगशाला है। यह विज्ञान अनेकों आश्चर्यचकित रसायनों से परिपूर्ण है। ब्रह्मांड में रासायनिक अभिक्रियाओं के द्वारा ही तारों की उत्पत्ति, ग्रहों का प्रादूर्भाव तथा ग्रहों पर जीवन संभव हुआ हैं।
रसायन विज्ञान को जीवनोपयोगी विज्ञान की संज्ञा भी दी गई है, क्योंकि हमारे शरीर की आंतरिक गतिविधियों में इस विज्ञान की महती भूमिका हैं।
पृथ्वी पर समस्त ऊर्जा का एकमेव स्रोत सूर्य है जो विगत लगभग 5 अरब वर्षो से रोशनी तथा ऊष्मा दे रहा है, पेड़-पौधे उग रहे हैं, जीव-जंतु चल फिर रहे हैं, बादल घुमड़ पेड़-पौधे उग रहे हैं, जीव-जंतु चल फिर रहे हैं, बादल घुमड़ रहे हैं, कहीं आकाषीय विद्युत् की चमक तथा कड़क है, कहीं आँधी तो कहीं तूफान अपनी उपस्थिति दर्ज करा रहे हैं, कहीं भूकंप तो कहीं सुनामी की घटनाएं घटित हो रही हैं।
इन सभी घटनाओं में रसायन ही अपना करतब दिखा रहे हैं।
ये सभी किसी न किसी पदार्थ से निर्मित हैं, जो ठोस, द्रव या गैस रूप में होते हैं परंतु हैं ये भी रसायन।
हमारे जीवन का कोई भी पक्ष रसायनों से अछूता नहीं है।
वैज्ञानिकों ने हमारे जीवन को भी रासायनिक क्रिया की संज्ञा दी है।
जीवन के समस्त लक्षण रासायनिक प्रक्रियाओं की अनुगूंज हैं।
सजीवों में पोषण, वृद्धि, पाचन, उत्सर्जन, प्रजनन की प्रक्रियाएं रासायनिक अभिक्रियाएं ही है।
मानव के संवेदी अनुभवों जैसे, शब्द स्पर्श, रूप, रस तथा गंध, इन सभी के पीछे रासायनिक क्रियाएं उत्तरदायी हैं।
वस्तुतः रसायन विज्ञान का संबंध हमारे दैनिक जीवन से है।
शुरुआत हम सुबह की चाय से करते हैं जो कि दूध, चीनी, चाय-पत्ती के साथ उबला हुआ जलीय घोल है।
रोटी, कपड़ा और मकान जैसी बुनियादी आवष्यकताएं पूरी करने में रसायनों की भूमिका है।
हम जहाँ कहीं भी देखते हैं, रसायनें के नजारे ही दिखते हैं।
दैनंदिन उपयोग की चीजें, जैसे - साबुन, तेल, ब्रश, मंजन, कंघी, शीशा, कागज, कलम, स्याही, दवाइयां, प्लास्टिक आदि रसायन विज्ञान की ही देन हैं।
धर्म-कर्म, पूजा-पाठ, स्नान, धूप-दीप, नैवेद्य, अगरबत्ती, रोली, रक्षा तथा कर्पूर इत्यादि सब में रसायन व्याप्त हैं।
उत्सवों तथा तीज त्यौहारों में दीये, मोमबत्ती तथा पटाखों के पीछे भी रसायन व्याप्त हैं।
यातायात, दूरसंचार, परिवहन तथा ऊर्जा के विविध स्रोत जैसे - कोयला, पेट्रोल, डीजल, मिट्टी का तेल, नैप्था एवं

भोजन पकाने की गैस भी विविध रासायनिक यौगिकों के उदाहरण हैं।
मानव जीवन को आरामदायक बनाने में रसायन विज्ञान ने अप्रतिम भूमिका निभाई है।
हमारे दैनिक जीवन में प्रयोग होने वाले औजार, उपकरण तथा युक्तियाँ जैसे - कुर्सी, मेज, टी.वी. फ्रिज, घड़ी, कुकर, इस्तरी, मिक्सर, ए.सी., चूल्हा, बर्तन, रंग-रोगन (पेंट्स), कपड़े, वर्णक (पिगमेंट्स) तथा रंजक (डाइज) अपमार्जक (डिटर्जेंट्स), कीटनाशक, विविध सौन्दर्य प्रसाधन अपमार्जक (डिटर्जेंट्स), कीटनाशक, विविध सौन्दर्य प्रसाधन सामग्रियां आदि सभी में रसायन विज्ञान का ही अवदान हैं।
वस्तुतः रसायनों का संबंध प्रत्येक गैस, द्रव या ठोस पदार्थ से है। जिस वातावरण में हम रहते हैं तथा सांस लेते हैं वह विविध रसायनों से ही निर्मित है। वायुमंडल में नाइट्रोजन, ऑक्सीजन, कार्बन डाइऑक्साइड, आर्गन आदि गैसें विद्यमान रहती हैं।
रोगोपचार में रसायन विज्ञान

चिकित्सा विज्ञान की प्रगति रसायन विज्ञान की ही देन है। वर्तमान में 75 प्रतिशत औषधियों का संश्लेषण रासायनिक पदार्थो से हुआ है। आज लगभग 4000 ज्ञात औषधियाँ हैं परंतु रोगों की संख्या 30,000 के लगभग है। अतः भविष्य में रोगशमन हेतु रसायन विज्ञान का प्राधान्य है।
औषधियों का वर्गीकरण
1. सिरदर्द एवं अन्य वेदनानाशक
2. जलने की दवाएं
3. जुकाम खाँसी रोधक
4. निर्जनीकारक
5. मृदुविरेचक (Laxatives)
6. मूर्च्छाकारी, संवेदनहारी औषधियां
7. उत्तेजक (Stimulants)

सिरदर्द : ऐस्पिरिन (C9H8O4) - alicylic Acid का ऐसीटिक एस्टर

जलने की दवाएं - त्वचा जलन जले भाग पर टैनिक अम्ल तथा बर्नोल

जुकाम खाँसी - देश के 75 प्रतिशत लोग ग्रसितकुल्लिया - थाइमाल, मेंथालटिकिया - ऐसीटनीलाइडनाक से लेने वाली - मेंथाल, कर्पूर, प्रोपिलीन ग्लाइकाल की फुहारनिर्जर्मीकारक (Antiseptic) - डेटॉल, मरक्यूरोक्रोम, बोरिक अम्लमृदुरेचक - एप्सम लवण, फीनाप्थैलीन स्ट्रिकनीनयातना निवारक - निष्चेतक - ईथर, एथिलीन, नाइट्रस ऑक्साइड

सम्मोहक या निद्राकारी - फीनोबार्बिटल

एंटीबायोटिक - डॉ॰ अलेक्जेडर फ्लेमिंग ने 1928 में पेनिसिलियम कवकों से पेनिसिलीन प्राप्त की - स्ट्रेप्टोमाइसीन, टेट्रामाइसिन, बायोमाइसिन, एरिथ्रोमाइसिन - एंटीबायोटिक शृंखला का संश्लेषण
गिहिणियों के लिए तथा खाद्य पदार्थो में रसायन
स्टेनलेस स्टील के बर्तन - लोहे में 14% नाइक्रोम (क्रोमियम और निकिल की मिश्र धातु) का मिश्रण
ब्रास के बर्तन - (कॉपर और जिंक मिश्र धातु) से बने बर्तन
ब्रॉन्ज के बर्तन - (कीमती मिश्र धातु जो 88% कॉपर, 10% टिन तथा 2 प्रतिशत जिंक) ; खेलों में गोल्ड, सिल्वर एवं ब्रॉन्ज मैडल
रबड़ - पेट्रोलियम के हाइड्रोकार्बन और ब्यूटाडाइन स्टाइटीन
एलुमिनियम के बर्तन - बॉक्साइट (Al2O3)
सिल्वर के बर्तन - मुलायम धातु इसमें कॉपर या निकल मिला दिया जाता है।
प्लास्टिक की तश्तरियां, प्याले आदि - ये बैकेलाइट के बने होते हैं, जो फीनॉल और फार्मेलडिहाइड से बनाया जाता है।
रबड़ - पेट्रोलियम के हाइड्रोकार्बन और ब्यूटाडाइन स्टाइटीन के यौगिक को अन्य रासायनिक पदार्थो के साथ मिलाने पर बने नये पदार्थ को 'कृत्रिम रबड़' कहते है।
भारी वाहनों के टायर - क्लोरोप्रोन रबड़
वायुयान के टायर - सुचालक बहुलक
खाद्यों में भरा रसायन - आहार के 6 मुख्य रासायनिक घटक - कार्बोहाइड्रेट, प्रोटीन, लिपिड, विटामिन, खनिज, जल
घरों में तरह-तरह के रसायनों का प्रयोग
पेट की शिकायत - सिरका - एसीटिक एसिड लवण एवं जल।
खाने का सोडा - सोडियम बाइकार्बोनेट
धावन सोडा - सोडियम कार्बोनेट (Na2CO3)
खाने का नमक - NaCl
सेंधा नमक - KCl
फिटकरी - K2SO4, Al2(SO4)3, 24H2O
बैटरियों में - H2SO4
बुझा चूना - Ca(OH)2
ऐल्कोहॉलिक पेय पदार्थो में इथेनॉल
फूलों की सुगंध - फ्लेवोन्स तथा फ्लेवोनाइड।
रास्पबेरी की गंध - आयोनिन
केले की गंध - आइसोएमाइल एसीटेट
नींबू की ताजगी - लिमोनिन यौगिक खट्टापन - सिट्रिक अम्ल
अम्लता (एसिडिटी) होने पर एटांसिड दवाइयां - Mg(OH)2। इससे आमाशय MgCl2 तथा पानी बनाता है जिससे अम्लता में कमी आती है।
संगमरमर तथा खड़िया मिट्टी में - CaCO3 यौगिक।
टूथपेस्ट का मुख्य घटक Al2O3
माउथवॉश में आयोडीन के यौगिक - कीटाणुरोधी
रसायन विज्ञान के द्वारा खाद्य पदार्थो, यथा - दूध, देशी घी, सरसों के तेल, हरी सब्जी, दाल, आटा, चाय तथा मसालों में मिलावट की भी सरल विधियों द्वारा घर पर ही जाँच की जा सकती है।
रंग-रोगन तथा वार्निश में टाइटेनियम ऑक्साइड तथा पॉलियूरीथेन का प्रयोग किया जाता है। मकानों में प्रयोग

किए जाने वाले पेंट का आधार एक्रीलिक लैटेक्स होता है।
कांच के निर्माण में रसायन
कांच विश्व का पहला संश्लिष्ट थर्मोप्लास्टिक है। इसे किसी भी रूप में ढाला जा सकता है। रेत (SiO2), चूने का पत्थर (CaO), सोडियम ऑक्साइड (Na2O) और अन्य खनिज तथा धातुओं को परस्पर पिघलाकर कांच बनाया जाता है तथा इसके विभिन्न बर्तन आदि बनाये जाते है। आजकल कांच का कई प्रकार से उपयोग होता है।
रंगीन कांच बनाने हेतु इसमें विभिन्न प्रकार के रासायनिक लवण मिलाए जाते हैं -पीला नीला या हरा - Fe2O3पीला - Fe(OH)3हल्का पीला - लेडगुलाबी या हल्का पीला गुलाबी - सेलिनियमनीला - कॉपरहरा - अधिक मात्रा में कॉपरलाल - कॉपर ऑक्साइड
प्लास्टिक के साथ कांच
कांच के फाइबर जब प्लास्टिक के साथ संयोग करते है तो अत्यधिक मजबूत पदार्थ बनता है जिसे प्रबलित प्लास्टिक (Reinforced plastic) कहते हैं इनका छत, नौका, खेल के सामान, सूटकेस तथा ऑटोमोबाइल की बॉडी बनाने में उपयोग किया जाता है।
ग्लास वुल - ठीले ग्लास फाइबर का बंडल, अच्छा ऊष्मारोधी, इसका उपयोग - फ्रिज, अवन, कुकर तथा गरम पानी की बोतलों में होता है।
साबुन और अपमार्जक
साफ-सफाई के लिए साबुन का इस्तेमाल लगभग 2800 ई.पूर्व का है। दूसरी सदी मे यूनानी चिकित्सक गालेन ने क्षारीय घोल से साबुन निर्माण का उल्लेख किया है।
साबुन वसा अम्ल का सोडियम लवण है। स्टीएरिक एसिड, पामिटिक एसिड, ओलिक एसिड तथा लिनोलेइक एसिड का सोडियम या पोटैशियम लवण।
सोडियम वाले साबुन ठोस व कठोर होते हैं जबकि पोटैशियम वाले मृदु तथा द्रव। साबुन का सूत्र : C17H35COONa
शैम्पू भी ऐल्कोहल मिश्रित साबुन। इसमें तेल को गंधक के अम्ल से अभिकृत करके जलविलेय बनाया जाता है।
गंजेपन दूर करने हेतु निर्जर्मीकारक- रिसंर्सिनाल
अपमार्जक (डिटर्जेट) पर पानी की प्रकृति का प्रभाव नही पड़ता। अतः अघिक लोकप्रिय है।
स्टेशनरी
रासायनिक प्रक्रिया से ही लकड़ी से कागज की प्राप्ति होती है। कागज की प्राप्ति में सैंकड़ों लीटर पानी के साथ रासायनिक उपचार किया जाता है। पेंसिल, कटर, शार्पनर, इरेजर, ह्वाइटनर, स्याही आदि सभी रसायन है।
फोटोग्राफी
रसायन विज्ञान पर आधारित फोटोग्राफी प्रक्रिया। निगेटिव से पॉजिटिव चित्र सोडियम थायोसल्फेट से लेपित कागज
कीटाणुनाशक दवाइयां
डेटॉल - प्रचलित कीटाणुनाशक - घरों मे प्रयोग (क्लोरोजाइलीनॉल)
फिनाइल - अधिक प्रचलित
घाव तथा शल्य क्रिया में जीवाणुनाशक रसायन (ऐल्कोहॉल) 60-90 प्रतिशत तथा बोरिक एसिड- सर्वतोसुलभ
चोट की मरहमपट्टी के लिए पूर्व में H2O2 से सफाई; आयोडीन के टिंचर का भी प्रयोग
फीनॉल या कार्बोलिक एसिड - जीवाणुनाशक - सर्जन द्वारा शल्य क्रिया के पूर्व हाथों की सफाई
ब्लींचिग पाउडर (CaOCl2) का प्रयोग जल स्रोतों व नालियों, परनालों, की सफाई में प्रयुक्त।
सौन्दर्य प्रसाधनों में छिपे रसायन
क्रीम या कोल्डक्रीम - जैतून का कोई खनिज तेल, मोम, पानी और बोरेक्स के मिश्रण से चेहरे की क्रीम बनती है। सुगंध हेतु इत्र, एल्कोहॉल, एल्डिहाइड, कीटोन, फीनॉल।
पाउडर - खडिया, टैलकम, जिंक ऑक्साइड, चिकनी मिट्टी का चूर्ण, स्टार्च, रंगने का पदार्थ सुगंध
लिपिस्टिक - मोम तथा तारकोल से निर्मित रंग सामग्री। मिश्रण में चिकनाई हेतु कोई तेल मिलाया जाता है।
शेविंग क्रीम - स्टियरिक अम्ल, तेल, ग्रीस तथा पोटैशियम हाइड्रोक्साइड
नेलपॉलिश - जल्दी सूखने वाला एक प्रकार का रोगन जिसमें रंग लाने के लिए टाइटेनियम ऑक्साइड (TiO2) मिलाया जाता है। आजकल नाइट्रोसेल्युलोज, एसीटोन, एमाइल ऐसीटेट आदि। रंग मिटाने हेतु एथिल एसीटेट, ऐसीटोन तथा जैतुन का तेल।
कृषि रसायन
रासायनिक कीटनाशक (Pesticides), कवकनाशक (Fingicides), विकसित
मिट्टीविहीन कृषि - जल कृषि (Hydrophonics)
ऊसर भूमि सुधार में गंधक का अम्ल तथा जिप्सम का प्रयोग
रासायनिक उर्वरक - यूरिया, म्यूरेट ऑफ पोटाश, सल्फेट ऑफ पोटाश, डी.ए.पी., सी.ए.एन. आदि।



उद्योगों में प्रयुक्त रसायन
रसायन विज्ञान की भूमिका के बिना उद्योग संभव नही। प्लास्टिक, कपड़ा, उर्वरक, कांच, धातु, कागज, चमड़ा, कोयला, धातु, कागज, चमड़ा, कोयला, गैस, पेट्रोरसायन, गंधक एवं क्लोरीन से प्राप्त रसायन, चूने से प्राप्त रसायन आदि।
विस्फोटक पदार्थ : (खान खोदने, इमारत गिराने, तेल और गैस के कुंए खोदने में प्रयुक्त) अनेक नाइट्रेट यथा- सेल्युलोज नाइट्रेट तथा नाइट्रोग्लिसरीन, पोटैशियम नाइट्रेट आदि विस्फोटक है।
नाभिकीय रसायन विज्ञान
इस रसायन विज्ञान की शाखा के अन्तर्गत रेडियोधर्मिता, तथा नाभिकीय प्रक्रमों का अध्ययन किया जाता है।
हरित रसायन
यह नवीनतम शाखा है जिसे 'टिकाऊ रसायन विज्ञान' (Green and sustainable Chemistry) भी कहते है। ग्रीन या हरित रसायन का तात्पर्य ऐसे रासायनिक उत्पादों या रासायनिक प्रक्रियाओं के डिजाइन से है जो हानिकारक अपशिष्ट के उत्पादन या इस्तेमाल को कम या समाप्त करता है।
ड्राइक्लीनिंग में परक्लोरोइथीलिन (कैंसरकारक) की जगह द्रवित कार्बनडाइ ऑक्साइड का प्रयोग।
आइबूप्रोफिन नामक दवा - पीड़ा व ज्वरनाशक का निर्माण 10 से 6 चरणों में संभव, प्रदूषण में 30 प्रतिशत कमी।
पेपर मिलों में सेलुलोस विरंजित करने हेतु क्लोरीन के स्थान पर सुरक्षित विकल्प विकसित।
रेत के कणों पर ग्रेफाइट ऑक्साइड की नैनों परत चढाकर पानी छानने का एक अत्यंत सरल व प्रभावकारी फिल्टर विकसित।
उद्योगों में हरित एंजाइमों का प्रयोग।
कृषि संबंधी रसायन, प्लास्टिक फाइबर आदि जैव-उत्प्रेरकों के द्वारा कम लागत पर उपलब्ध।
उद्योगों में हरित एंजाइमों का प्रयोग।
कार्बनिक रसायन विज्ञान, जैव कार्बनिक रसायन विज्ञान तथा जैव रसायन विज्ञान के मेल से औषधि क्षेत्र में अप्रत्याशित लाभ - हरित रसायन विज्ञान की ही देन।
पॉलिलैक्टिक एसिड जो जैव-सुसंगत फाइबेरा, जैव अपघटनीय सीवन और पैकेजिंग में उपयेग।
भारत में आई.आई.टी. गुवाहाटी, कानपुर व दिल्ली में हरित उत्प्रेरक विधि विकसित। औषधि उद्योग में कारगर।
कार्न सिरप का खाद्य उद्योग में उपयोग



विभिन्न रहस्यों में छुपे रसायन
आतिशबाजी में रसायनों का करिश्मा - आतिशबाजी के निर्माण तथा उपयोग की तकनीक - पायरोटैक्नीक या अग्निक्रीड़ा। प्रयुक्त रसायन डेक्सट्रिन, चारकोल, रेडगम, एलुमिनियम, पोटैषियम परक्लोरेट तथा अमोनियम परक्लोरेट।
जैसे ही आतिशबाजियों में कवच पर आग लगाई जाती है, ईंधन व ऑक्सीकारक 2200 से 36000 से तापमान के बीच क्रिया करते हैं, जिससे आवाज उत्पन्न होती है।
आतिशबाजियों को रंगीन बनाने में SrCO3, नाइट्रेट तथा क्लोरेट से हरा रंग आतिशबाजी में प्रयुक्त कागज टच पेपर को KnO3 में भिगोने पर आतिशबाजी-ज्वलनशील।
मेंहदी के रंग में रसायन
लॉसोन, जो नेफ्थाक्यूनोन वर्ग का रसायन है, हाथों की त्वचा में विद्यमान प्रोटीन की झाल से हाथों की त्वचा में विद्यमान प्रोटीन की झाल से क्रिया करके लाल रंग देता है।
गिरगिट के रंग बदलने का कारण : गिरगिट की विशेष रंजक कोशिकाएं मैलेनोफोर - ताप बढ़ने तथा घटने के साथ-साथ सिकुड़ती है। ये कोशिकाएं, इनके शरीर में स्रावित होने वाले हारमोनों - इंटरमेडिन, एसीटिलकोलीन आदि से उत्तेजित होकर रंग बदलती है।
फूलों का रंग भगाना - हरे, पीले, नीले व लाल फूलों की पंखुड़ियों को जब सल्फर डाइ ऑक्साइड तथा क्लोरीन से संपर्क करवाया जाता है तो ये गैसे फूलों का रंग उड़ा देती हैं।
वृद्धावस्था की झुर्रियाँ भी रसायनों की देन - झुर्रियाँ चमड़ी की ऊपरी सतह में उपस्थित कोलेजन तथा इलास्टिन प्रोटीन फाइबर में हुई कमी के कारण।
कलाई घड़ी का सेल - लीथियम - कलाई घड़ी का सेल बटन आकार का होने से 'बटन सेल' कहलाता है। इसमें

लीथियम ऋणात्मक इलेक्ट्रोड का कार्य करता है, धनात्मक कोई ऑक्सीकारक।
हंसाने तथा रूलाने वाली गैसें - नाइट्रस ऑक्साइड गैस तथा नाइट्रिल ब्रोमाइड ; एथिल आयोडोएसिटेट अश्रु गैस के रूप में पुलिस द्वारा उपयोग।
आँसू की संरचना में रसायन - हमारे आँसुओं के द्रव में प्रोटीन, नाइट्रोजन, यूरिया, ग्लूकोज, सोडियम, पोटैषियम के ऑक्साइड, अमोनिया, क्लोरीन, सोडियम क्लोराइड, लाइसोजाइम एंजाइम आदि विद्यमान।
पानी में कुबड़ापन एवं बिगड़े दांत - मनुष्य के कुबड़े होने में पानी भी करिश्मा दिखाता है। अधिक समय तक फ्लोराइड युक्त जल का सेवन हड्डियों में तथा दाँत में विकृति प्रदान करता है जिससे कुबड़ापन एवं दाँतों में विकृतियां उत्पन्न होतीं हैं।
पानी में आग लगाने वाली धातु - सोडियम की पानी से घनिष्ठ मित्रता है।2Na + 2H2 -> 2NaOH + H2
जुगनू की चमक का राज : लूसीफेरिन C13H12N2S2O3 प्रकाश उत्पादक जुगनू की धड़ में विद्यमान + Mg = प्रकाश।
विश्व का सबसे मीठा पदार्थ : तालीम प्रोटीन जो शक्कर से पाँच हजार गुना मीठा।
धूप-छाँव का चश्मा रसायनों से भरा : फोटोक्रोमेटिक चश्मों में सिल्वर आयोडाइड एवं सिल्वर ब्रोमाइड के कण। धूप में अलग एवं छाया में पुनः युग्मित।
खाना पकाने की गैस द्रव : एलपीजी (Liquified petroleum gas) में मुख्य रूप से प्रोपेन एवं ब्यूटेन गैस गंधयुक्त थायोएल्कोहल मिश्रित। घरों में उपयोग के लिये इस गैस का अधिक दाब पर भरा गया होता है।
फूलों की सुगंध - टर्पीन तथा बैंजीन के व्युत्पन्न
कटा सेब बदरंग : काटने के बाद सफेद भाग बादामी - कैफीटेनिन, एपिकैटीचिन नामक टेनिन - हवा के संपर्क से ऑक्सीकरण।
मिर्च खाने से जलन में कैप्सिसिन का योगदान।
फलों को पकाने में इथिलीन गैस की भूमिका - हरे रंग के फल लाल-पीले रंग के हो जाते हैं।
ओजोन छिद्र - पृथ्वी से 15-50 किमी की ऊँचाई पर ओजोन की पतली परत पृथ्वी को घेरे रहती है। यह पृथ्वी को सूर्य की उच्च ऊर्जा वाली पराबैंगनी किरणों से बचाती है और हमारी जीवन रक्षा करती है। 1987 में पहली बार अंटार्कटिका में इस परत को गिरते देखा गया। इसके छिद्र बनने में क्लोरोफ्लोरो कार्बन की भूमिका।
नॉन-स्टिक बर्तनों की परत में टेफ्लॉन (पॉलिटेट्राफ्लुरोइथिलीन)
पान का रंग - कटेचूनिक अम्ल के कारण।
हाइड्रोपॉनिक्स - बिना मिट्टी से कृषि।
स्याहियों के राज में रसायन : बॉल प्वांइट पेन की स्याही - रंगीन रंजकों को ओलिक अम्ल, अरंडी का तेल तथा सल्फोनामाइड के साथ मिलाना।
चीटिंयों को रास्ता दिखाते रसायन : रानी, पंखयुक्त नर एवं पंखरहित मादा - तीन प्रजातियां चीटिंयां लगातार गंध फीरोमोन को छोड़ती है जिसे रास्ता पता लगता है।
स्टैंप पैड स्याही - इंडियुलिन नामक रंग को ग्लिसरीन, फीनोल या क्रीसॉल में घोलकर बनाई जाती है।
प्रिटिंग स्याही - मिनरल ऑयल, एनीलोन रंग तथा चुनाव में प्रयुक्त स्याही में सिल्वर साल्ट एवं एनीलीन यौगिक का प्रयोग।
महिलाओं की सहेली - बगैर स्टेरायडल, गैर हारमोनल गर्भ निरोधक गोली में सेंटक्रोमेन (Resorcinol से संष्लेषण) का योगदान।
ऑस्मियम सबसे भारी धातु और गैलियम, प्लेटीनम से भी महंगी धातु।
धब्बे छुड़ाने वाले रसायन
वनस्पति के धब्बे - (घास, चाय, सब्जी, कॉफी, फल) गरम पानी, साबुन तथा सुहागा।
जैवीय धब्बे - खून, थूक, कफ, अंडे, म्यूककस के दाग हेतु अमोनिया, नमक, नींबू, कार्बन टेट्राक्लोराइड।
रसायनजनित धब्बे - लोहा, स्याही, वार्निश, पेंट हेतु ऑक्सेलिक अम्ल एवं H2O2 का प्रयोग, वैसलीन, तेल के धब्बों के लिए सोडियम परबोरेट व क्लोरोफार्म।
घातक रसायन
आँखों में सुरमा में Sb2S3 के बदले PbS का प्रयोग - ऑख के लिए घातक। सीसा शरीर के लिए अत्यधिक विषालु धातु।
सौंदर्य प्रसाधनों में फार्मेल्डीहाइड का अत्यधिक उपयोग। यह शैंपू, परिरक्षक आदि में प्रयुक्त होने से घातक।
एलुमीनियम के बर्तन हानिकारक (हल्के, सस्ते, जंगरहित एवं प्रचुर उपलब्ध)। एलुमीनियम के बर्तनों में खट्टी वस्तुएं, नमक व सोडा, दही, चाय, चटनी, सिरका फलों का रस, टमाटर का रस आदि कभी नहीं रखने चाहिए।
उच्च एलुमीनियम युक्त भोजन या चाय लगातार सेवन से मस्तिष्क की कोशिकाओं की क्षति।

सारांश :
उर्जा - सेल, बैटरियाँ, परमाणु भट्ठी, पेट्रोलियम आदि
दवाएँ
खाद
कीटनाशक
धातुएँ, प्लास्टिक एवं अन्य निर्माण सामग्री
कपड़े
सीमेंट
साबुन, तेल, सौन्दर्य प्रसाधन
आईसी निर्माण के लिये उच्च गुणवत्ता वाली सिलिकॉन वेफर
अपराधियों को पकड़ने के लिये सहायक
गोला-बारूद, विस्फोटक एवं अन्य युद्ध सामग्री

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सोमवार, 2 जुलाई 2018

GK in Hindi Questions Answers



● भारतीय रिजर्व बैंक के गवर्नर कौन हैं?
→ रघुराम राजन
● अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष का मुख्यालय कहां है
→ वाशिंगटन
● भारत में विदेशी मुद्रा पर किसका नियंत्रण है
→रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया
● विश्व बैंक का मुख्यालय कहाँ स्थित है
→ वाशिंगटन डी. सी.
● पूर्ण रूप से प्रथम भारतीय बैंक कौन-सा था?
→ पंजाब नेशनल बैंक
● एशियाई विकास बैंक का मुख्यालय कहां स्थित है
→ मनीला
● भारत में 50 रुपए के करेंसी नोट पर हस्ताक्षर होते हैं
→ गवर्नर, आरबीआई
● मुख्यतः आवास ऋण का संबंध जिस बैंक से है वह है
→ HDFC
● लाला लाजपत राय के प्रयासों से शुरू किया गया बैंक
→पंजाब नेशनल बैंक
● ‘पिगमी डिपॉजिट स्कीम’ किस बैंक की प्रचलित योजना है?
→ सिंडिकेट बैंक
● भारत का सबसे अधिक शाखाओं वाला बैंक
→ भारतीय स्टेट बैंक
● भारत में कार्यरत निजी क्षेत्र का सबसे बड़ा बैंक
→ आईसीआईसीआई बैंक
● भारतीय स्टेट बैंक का पुराना नाम है
→ इंपीरियल बैंक ऑफ इंडिया
● भारतीय रुपए को नई पहचान प्राप्त हुई
→15 जुलाई, 2010 में
● निवेश के संदर्भ में A, AA+ और AAA से तात्पर्य है
→ क्रेडिट रेटिंग
● बैंकिंग क्षेत्र जिस क्षेत्र के अंतर्गत आता है, वह है
→ सेवा क्षेत्र
● भारत का प्रथम आई.एस.ओ. प्रमाण पत्र वाला बैंक है
→ केनरा बैंक
● वर्तमान समय में स्टेट बैंक ऑफ इंडिया की अध्यक्ष
→ अरूंधती भट्टाचार्या
● बैंकों के चेकों के संसाधन के लिए प्रयोग किया जाता है
→ MICR का
● विश्व बैंक का मुख्यालय स्थित है
→ वाशिंगटन
● अल्पकालिक सरकारी प्रतिभूति-पत्र को कहा जाता है
→ ट्रेजरी बिल
● किस बैंक ने सर्वप्रथम चीन में अपनी शाखा खोली?
→ एसबीआई

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मौर्य काल

मौर्य काल


विवरण प्राचीन भारत के इतिहास में मुख्यत: मौर्य काल, शुंग काल, शक एवं कुषाण कालआते हैं।
मौर्य काल 322-185 ईसा पूर्व
शासक चंद्रगुप्त मौर्य, बिन्दुसार, अशोक, कुणाल
संबंधित लेख अशोक के शिलालेख, मौर्ययुगीन पुरातात्विक संस्कृति, मौर्यकाल में दास प्रथा, मौर्य काल का शासन प्रबंध,मौर्यकालीन कला, बौद्ध धर्म, मौर्य साम्राज्य का पतन

GK Questions Answers
मौर्य राजवंश (322-185 ईसा पूर्व) प्राचीन भारत का एक राजवंश था। ईसा पूर्व 326 में सिकन्दर की सेनाएँ पंजाब के विभिन्न राज्यों में विध्वंसक युद्धों में व्यस्त थीं। मध्य प्रदेश और बिहार में नंद वंश का राजा धननंद शासन कर रहा था। सिकन्दर के आक्रमण से देश के लिए संकट पैदा हो गया था। धननंद का सौभाग्य था कि वह इस आक्रमण से बच गया। यह कहना कठिन है कि देश की रक्षा का मौक़ा पड़ने पर नंद सम्राट यूनानियों को पीछे हटाने में समर्थ होता या नहीं। मगध के शासक के पास विशाल सेना अवश्य थी, किन्तु जनता का सहयोग उसे प्राप्त नहीं था। प्रजा उसके अत्याचारों से पीड़ित थी। असह्य कर-भार के कारण राज्य के लोग उससे असंतुष्ट थे। देश को इस समय एक ऐसे व्यक्ति की आवश्यकता थी, जो मगध साम्राज्य की रक्षा तथा वृद्धि कर सके। विदेशी आक्रमणसे उत्पन्न संकट को दूर करे और देश के विभिन्न भागों को एक शासन-सूत्र में बाँधकर चक्रवर्ती सम्राट के आदर्श को चरितार्थ करे। शीघ्र ही राजनीतिक मंच पर एक ऐसा व्यक्ति प्रकट भी हुआ। इस व्यक्ति का नाम था- 'चंद्रगुप्त'। जस्टिन आदि यूनानी विद्वानों ने इसे 'सेन्ड्रोकोट्टस' कहा है। विलियम जॉन्स पहले विद्वान थे, जिन्होंने सेन्ड्रोकोट्टस' की पहचान भारतीय ग्रंथों के 'चंद्रगुप्त' से की है। यह पहचान भारतीय इतिहास के तिथिक्रम की आधारशिला बन गई है।
चंद्रगुप्त मौर्य
 चंद्रगुप्त मौर्य

चंद्रगुप्त के वंश और जाति के सम्बन्ध में विद्वान एकमत नहीं हैं। कुछ विद्वानों ने ब्राह्मण ग्रंथों, मुद्राराक्षस, विष्णुपुराण की मध्यकालीन टीका तथा 10वीं शताब्दी की धुण्डिराज द्वारा रचित 'मुद्राराक्षस' की टीका के आधार पर चंद्रगुप्त को 'शूद्र' माना है। चंद्रगुप्त के वंश के सम्बन्ध में ब्राह्मण, बौद्ध एवं जैन परम्पराओं व अनुश्रुतियों के आधार पर केवल इतना ही कहा जा सकता है कि वह किसी कुलीन घराने से सम्बन्धित नहीं था। विदेशी वृत्तांतों एवं उल्लेखों से भी स्थिति कुछ अस्पष्ट ही बनी रहती है।
राजनीतिक परिस्थितियाँ

जिस समय चंद्रगुप्त मौर्य साम्राज्य के निर्माण में तत्पर था, सिकन्दर का सेनापति सेल्यूकस अपनी महानता की नींव डाल रहा था। सिकन्दर की मृत्यु के बाद उसके सेनानियों में यूनानी साम्राज्य की सत्ता के लिए संघर्ष हुआ, जिसके परिणामस्वरूप सेल्यूकस, पश्चिमएशिया में प्रभुत्व के मामले में, ऐन्टिगोनस का प्रतिद्वन्द्वी बना। ई. पू. 312 में उसने बेबिलोन पर अपना अधिकार स्थापित किया। इसके बाद उसने ईरान के विभिन्न राज्यों को जीतकर बैक्ट्रिया पर अधिकार किया। अपने पूर्वी अभियान के दौरान वह भारत की ओर बढ़ा। ई. पू. 305-4 में काबुल के मार्ग से होते हुए वह सिंधु नदी की ओर बढ़ा। उसने सिंधु नदी पार की और चंद्रगुप्त की सेना से उसका सामना हुआ। सेल्यूकस पंजाब और सिंधु पर अपना प्रभुत्व पुनः स्थापित करने के उद्देश्य से आया था। किन्तु इस समय की राजनीतिक स्थिति सिकन्दर के आक्रमण के समय से काफ़ी भिन्न थी। पंजाब और सिंधु अब परस्पर युद्ध करने वाले छोटे-छोटे राज्यों में विभिक्त नहीं थे, बल्कि एक साम्राज्य का अंग थे। आश्चर्य की बात है कि यूनानी तथा रोमी लेखक, सेल्यूकस और चंद्रगुप्त के बीच हुए युद्ध का कोई विस्तृत ब्यौरा नहीं देते।
केवल एप्पियानस ने लिखा है कि- "सेल्यूकस ने सिंधु नदी पार की और भारत के सम्राट चंद्रगुप्त से युद्ध छेड़ा। अंत में उनमें संधि हो गई और वैवाहिक सम्बन्ध स्थापित हो गया।"
जस्टिन के अनुसार चंद्रगुप्त से संधि करके और अपने पूर्वी राज्य को शान्त करके सेल्यूकस एण्टीगोनस से युद्ध करने चला गया। एप्पियानस के कथन से स्पष्ट है कि सेल्यूकस चंद्रगुप्त के विरुद्ध सफलता प्राप्त नहीं कर सका। अपने पूर्वी राज्य की सुरक्षा के लिए सेल्यूकस ने चंद्रगुप्त से संधि करना ही उचित समझा और उस संधि को उसने वैवाहिक सम्बन्ध से और अधिक पुष्ट कर लिया।

 General Knowledge Question Answer


चंद्रगुप्त की मृत्यु के पश्चात उसका पुत्र 'बिन्दुसार' सम्राट बना। यूनानी लेखों के अनुसार उसका नाम 'अमित्रकेटे' था। विद्वानों के अनुसार 'अमित्रकेटे' का संस्कृत रूप है- 'अमित्रघात' या 'अमित्रखाद' अर्थात "शत्रुओं का नाश करने वाला"।
स्ट्रैवो के अनुसार सेल्यूकस के उत्तराधिकारी 'एण्टियोकस प्रथम' ने अपना राजदूत 'डायमेकस' बिन्दुसार के दरबार में भेजा था।
प्लिनी के अनुसार 'टॉलमी द्वितीय' फिलेडेल्फस ने डायोनियस को बिन्दुसार के दरबार में नियुक्त किया।
अपने पिता की भाँति बिन्दुसार भी जिज्ञासु था और विद्वानों तथा दार्शनिकों का आदर करता था। ऐथेनियस के अनुसार बिन्दुसार ने एण्टियोकस (सीरिया का शासक) को एक यूनानी दार्शनिक भेजने के लिए लिखा था। दिव्यावदान की एक कथा के अनुसार आजीवक परिव्राजक बिन्दुसार की सभा को सुशोभित करते थे।
पुराणों के अनुसार बिन्दुसार ने 24 वर्ष तक, किन्तु महावंश के अनुसार 27 वर्ष तक राज्य किया। डॉ. राधा कुमुद मुखर्जी]ने बिन्दुसार की मृत्यु तिथि ईसा पूर्व 272 निर्धारित की है। कुछ अन्य विद्वान यह मानते हैं कि बिन्दुसार की मृत्यु ईसा पूर्व 270 में हुई।
अशोक
मुख्य लेख : अशोक

अशोक
Ashoka

अशोक (काल ईसा पूर्व 269-232) प्राचीन भारत में मौर्य राजवंश का राजा था। अशोक का 'देवनाम प्रिय' एवं 'प्रियदर्शी' आदि नामों से भी उल्लेख किया जाता है। उसके समय मौर्य राज्य उत्तर में हिन्दुकुश की श्रेणियों से लेकर दक्षिण में गोदावरी नदी के दक्षिण तथा मैसूर, कर्नाटक तक तथा पूर्व मेंबंगाल से पश्चिम में अफ़ग़ानिस्तान तक पहुँच गया था। यह उस समय तक का सबसे बड़ा भारतीय साम्राज्य था। सम्राट अशोक को अपने विस्तृत साम्राज्य के बेहतर कुशल प्रशासन तथा बौद्ध धर्म के प्रचार के लिए जाना जाता है। जीवन के उत्तरार्ध में अशोक गौतम बुद्ध के भक्त हो गया और उन्हीं महात्माबुद्ध की स्मृति में उन्होंने एक स्तम्भ खड़ा कर दिया जो आज भी नेपाल में उनके जन्मस्थल-लुम्बिनी में मायादेवी मन्दिर के पास अशोक स्‍तम्‍भ के रूप में देखा जा सकता है। उसने बौद्ध धर्म का प्रचार भारत के अलावा श्रीलंका, अफ़ग़ानिस्तान, पश्चिम एशिया, मिस्र तथा यूनान में भी करवाया। अशोक के अभिलेखों में प्रजा के प्रति कल्याणकारी दृष्टिकोण की अभिव्यक्ति की गई है|
बिंदुसार का पुत्र "अशोक महान"


अशोक प्राचीन भारत के मौर्य सम्राट बिंदुसार का पुत्र था, जिसका जन्म लगभग 304 ई. पूर्व में माना जाता है। भाइयों के साथ गृह-युद्ध के बाद 272 ई. पूर्व अशोक को राजगद्दी मिली और 232 ई. पूर्व तक उसने शासन किया। आरंभ में अशोक भी अपने पितामह चंद्रगुप्त मौर्य और पिता बिंदुसार की भांति युद्ध के द्वारा साम्राज्य विस्तार करता गया। कश्मीर, कलिंग तथा कुछ अन्य प्रदेशों को जीतकर उसने संपूर्ण भारत में अपना साम्राज्य स्थापित कर लिया, जिसकी सीमाएँ पश्चिम में ईरान तक फैली हुई थीं। परंतु कलिंग युद्ध में जो जनहानि हुई उसका अशोक के हृदय पर बड़ा प्रभाव पड़ा और वह हिंसक युद्धों की नीति छोड़कर धर्म विजय की ओर अग्रसर हुआ। अशोक की प्रसिद्धि इतिहास में उसके साम्राज्य विस्तार के कारण नहीं वरन धार्मिक भावना और मानवतावाद के प्रचारक के रूप में अधिक है।

बिन्दुसार की मृत्यु के बाद अशोक राजा हुआ। अशोक के सम्बन्ध में जानकारी प्राप्त करने में प्रमुख साधन उसके शिलालेख तथा स्तंभों पर उत्कीर्ण अभिलेख हैं। किन्तु ये अभिलेख अशोक के प्रारम्भिक जीवन पर कोई प्रकाश नहीं डालते। इनके लिए हमें संस्कृत तथा पालि में लिखे हुए बौद्ध ग्रंथों पर ही निर्भर रहना पड़ता है। परम्परानुसार अशोक ने अपने भाइयों का हनन करके सिंहासन प्राप्त किया था।
तक्षशिला और कलिंग
मुख्य लेख : तक्षशिला एवं कलिंग

अपने राज्याभिषेक के नवें वर्ष तक अशोक ने मौर्य साम्राज्य की परम्परागत नीति का ही अनुसरण किया। अशोक ने देश के अन्दर साम्राज्य विस्तार किया, किन्तु दूसरे देशों के साथ मैत्रीपूर्ण व्यवहार की नीति अपनाई।

भारत के अन्दर अशोक एक विजेता रहा। उसने खस, नेपाल को विजित किया और तक्षशिला के विद्रोह का शान्त किया। अपने राज्याभिषेक के नवें वर्ष में अशोक ने कलिंग पर विजय प्राप्त की। ऐसा प्रतीत होता है कि नंद वंश के पतन के बाद कलिंग स्वतंत्र हो गया था। प्लिनी की पुस्तक में उद्धत मेगस्थनीज़ के विवरण के अनुसार चंद्रगुप्त मौर्य के समय में कलिंग एक स्वतंत्र राज्य था। 'अशोक के शिलालेख' के अनुसार युद्ध में मारे गए तथा क़ैद किए हुए सिपाहियों की संख्या ढाई लाख थी और इससे भी कई गुने सिपाही युद्ध में घायल हुए थे। मगध की सीमाओं से जुड़े हुए ऐसे शक्तिशाली राज्य की स्थिति के प्रति मगध शासक उदासीन नहीं रह सकता था। खारवेल के समय मगध को कलिंग की शक्ति का कटु अनुभव था। सुरक्षा की दृष्टि से कलिंग का जीतना आवश्यक था। कुछ इतिहासकारों के अनुसार कलिंग को जीतने का दूसरा कारण भी था। दक्षिण के साथ सीधे सम्पर्क के लिए समुद्री और स्थल मार्ग पर मौर्यों का नियंत्रण आवश्यक था। कलिंग यदि स्वतंत्र देश रहता तो समुद्री और स्थल मार्ग से होने वाले व्यापार में रुकावट पड़ सकती थी। अतः कलिंग को मगध साम्राज्य में मिलाना आवश्यक था। किन्तु यह कोई प्रबल कारण प्रतीत नहीं होता, क्योंकि इस दृष्टि से तो चंद्रगुप्त के समय से ही कलिंग को मगध साम्राज्य में मिला लेना चाहिए था। कौटिल्य के विवरण से स्पष्ट है कि वह दक्षिण के साथ व्यापार का महत्त्व देता था। विजित कलिंग राज्य मगध साम्राज्य का एक अंग हो गया। राजवंश का कोई राजकुमार वहाँ वाइसराय (उपराजा) नियुक्त कर दिया गया। तोसली इस प्रान्त की राजधानी बनाई गई थी।
हृदय परिवर्तन

कलिंग युद्ध में हुए नरसंहार तथा विजित देश की जनता के कष्ट से अशोक की अंतरात्मा को तीव्र आघात पहुँचा। युद्ध की भीषणता का अशोक पर गहरा प्रभाव पड़ा। अशोक ने युद्ध की नीति को सदा के लिए त्याग दिया और 'दिग्विजय' के स्थान पर 'धम्म विजय' की नीति को अपनाया। डा. हेमचंद्र रायचौधरी के अनुसार मगध का सम्राट बनने के बाद यह अशोक का प्रथम तथा अन्तिम युद्ध था।
साम्राज्य की सीमा

अशोक के शिलालेखों तथा स्तंभलेखों से अशोक के साम्राज्य की सीमा की ठीक जानकारी प्राप्त होती है। शिला तथा स्तंभलेखों के विवरण से ही नहीं, वरन् जहाँ से अभिलेख पाए गए हैं, उन स्थानों की स्थिति से भी सीमा निर्धारण करने में सहायता मिलती है। इन अभिलेखों में जनता के लिए राजा की घोषणाएँ थीं। अतः वे अशोक के विभिन्न प्रान्तों में आबादी के मुख्य केन्द्रों में उत्कीर्ण कराए गए। कुछ अभिलेख सीमांत स्थानों पर पाए जाते हैं। उत्तर-पश्चिम में शहबाज़गढ़ी और मानसेहरा में अशोक के शिलालेख पाए गए। इसके अतिरिक्त तक्षशिला में और क़ाबुल प्रदेश में लमगान में अशोक के लेख अरामाइक लिपि में मिलते हैं। एक शिलालेख में एण्टियोकस द्वितीय थियोस को पड़ोसी राजा कहा गया है। इससे स्पष्ट है कि उत्तर-पश्चिम में अशोक के साम्राज्य की सीमा हिन्दुकुश तक थी।
शिलालेख और स्तूप
मुख्य लेख : ब्राह्मी लिपि अशोक-काल

ब्राह्मी लिपि

पूर्व में बंगाल तक मौर्य साम्राज्य के विस्तृत होने की पुष्टि महास्थान शिलालेख से होती है। यह अभिलेख ब्राह्मी लिपि में है और मौर्य कालका माना जाता है। 'महावंश' के अनुसार अशोक अपने पुत्र को विदा करने के लिए ताम्रलिप्ति तक आया था। चीनी यात्री ह्वेनसांग को भी ताम्रलिप्ति, कर्णसुवर्ण, समतट, पूर्वी बंगाल तथा पुण्ड्रवर्धन में अशोक के स्तूप देखने को मिले थे। 'दिव्यावदान' में कहा गया है कि अशोक के समय तक बंगाल मगध साम्राज्य का ही एक अंग था। आसाम कदाचित् मौर्य साम्राज्य से बाहर था। वहाँ पर अशोक के कोई स्मारक चीनी यात्री को देखने को नहीं मिले।
राज्यों से संबंध

यद्यपि अशोक का साम्राज्य विस्तृत था तथापि साम्राज्य के अंतर्गत सभी देशों पर उसका सीधा शासन था। अशोक के पाँचवे और तेरहवें शिलालेख में कुछ जनपदों तथा जातियों का उल्लेख किया गया है। जैसे- यवन, काम्बोज, नाभक, नाभापंक्ति, भोज, पितनिक, आन्ध्र, पुलिंद।रेप्सन का विचार है कि ये देश तथा जातियाँ अशोक द्वारा जीते गए राज्य के अंतर्गत न होकर प्रभाव क्षेत्र में थे।
धर्म परिवर्तन

इसमें कोई संदेह नहीं कि अपने पूर्वजों की तरह अशोक भी ब्राह्मण धर्म का अनुयायी था। 'महावंश' के अनुसार वह प्रतिदिन 60,000ब्राह्मणों को भोजन दिया करता था और अनेक देवी-देवताओं की पूजा किया करता था। कल्हण की 'राजतरंगिणी' के अनुसार अशोक के इष्ट देव भगवान शिव थे। पशुबलि में उसे कोई हिचक नहीं थी। किन्तु अपने पूर्वजों की तरह वह जिज्ञासु भी था। मौर्य राज्य सभा में सभी धर्मों के विद्वान भाग लेते थे, जैसे- ब्राह्मण, दार्शनिक, निग्रंथ, आजीवक, बौद्ध तथा यूनानी दार्शनिक।

संसार के इतिहास में अशोक इसलिए विख्यात है कि उसने निरन्तर मानव की नैतिक उन्नति के लिए प्रयास किया। जिन सिद्धांतों के पालन से यह नैतिक उत्थान सम्भव था, अशोक के लेखों में उन्हें 'धम्म' कहा गया है। दूसरे तथा सातवें स्तंभ-लेखों में अशोक ने धम्म की व्याख्या इस प्रकार की है- "धम्म है साधुता, बहुत से कल्याणकारी अच्छे कार्य करना, पापरहित होना, मृदुता, दूसरों के प्रति व्यवहार में मधुरता, दया-दान तथा शुचिता।" आगे कहा गया है कि- "प्राणियों का वध न करना, जीवहिंसा न करना, माता-पिता तथा बड़ों की आज्ञा मानना, गुरुजनों के प्रति आदर, मित्र, परिचितों, सम्बन्धियों, ब्राह्मण तथा श्रवणों के प्रति दानशीलता तथा उचित व्यवहार और दास तथा भृत्यों के प्रति उचित व्यवहार।"
बौद्ध धर्म
मुख्य लेख : बौद्ध धर्म

इसमें कोई संदेह नहीं कि अशोक बौद्ध धर्म का अनुयायी था। सभी बौद्ध ग्रंथ अशोक को बौद्ध धर्म का अनुयायी बताते हैं। अशोक के बौद्ध होने के सबल प्रमाण उसके अभिलेख हैं। राज्याभिषक से सम्बद्ध लघु शिलालेख में अशोक ने अपने को 'बुद्धशाक्य' कहा है। साथ ही यह भी कहा है कि वह ढाई वर्ष तक एक साधारण उपासक रहा। भाब्रु लघु शिलालेख में अशोक त्रिरत्न- बुद्ध, धम्म और संघ में विश्वास करने के लिए कहता है और भिक्षु तथा भिक्षुणियों से कुछ बौद्ध ग्रंथों का अध्ययन तथा श्रवण करने के लिए कहता है।
धर्म संबंधी शिलालेख
मुख्य लेख : अशोक के शिलालेख

अशोक के शिलालेख

शिलाओं तथा स्तंभों पर उत्कीर्ण लेखों के अनुशीलन से हम इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि 'अशोक का धम्म' व्यावहारिक फलमूलक (अर्थात फल को दृष्टि में रखने वाला) और अत्यधिक मानवीय था। इस धर्म के प्रचार से अशोक अपने साम्राज्य के लोगों में तथा बाहर अच्छे जीवन के आदर्श को चरितार्थ करना चाहता था। इसके लिए उसने जहाँ कुछ बातें लाकर बौद्ध धर्म में सुधार किया, वहीं लोगों को धर्म परिवर्तन के लिए विवश नहीं किया।

महत्त्वपूर्ण यह है कि एक शासक जिसके पास निरंकुश क़ानूनी विधान, विशाल सेना एंव अपरिमित संसाधन हो, वह अपने शिलालेखों में स्वयं को नैतिक मूल्यों के विस्तारक के रूप में प्रस्तुत क्यों करता है? वस्तुतः योग्य व कुशल शासकों की नियुक्तियां सदैव साम्राज्य की रक्षा के लिए निर्मित की जाती हैं| बौद्ध धर्म की शिक्षा के केंद्र मगध में जनमानस में शोषण के विरुद्ध व्यापक चेतना थी। सम्राट अशोक को बौद्ध धर्म का प्रचार करने और स्तूपादि को निर्मित कराने की प्रेरणा धर्माचार्य उपगुप्त ने ही दी। जब भगवान बुद्ध दूसरी बार मथुरा आये, तब उन्होंने भविष्यवाणी की और अपने प्रिय शिष्य आनंद से कहा कि- "कालांतर में यहाँ 'उपगुप्त' नाम का एक प्रसिद्ध धार्मिक विद्वान होगा, जो उन्हीं की तरह बौद्ध धर्म का प्रचार करेगा और उसके उपदेश से अनेक भिक्षु योग्यता और पद प्राप्त करेंगे।" इस भविष्यवाणी के अनुसार उपगुप्त ने मथुरा के एक वणिक के घर जन्म लिया। उसका पिता सुगंधित द्रव्यों का व्यापार करता था। उपगुप्त अत्यंत रूपवान और प्रतिभाशाली था। उपगुप्त किशोरावस्था में ही विरक्त होकर बौद्ध धर्म का अनुयायी हो गया था। आनंद के शिष्य 'शाणकवासी' ने उपगुप्त को मथुरा के नट-भट विहार में बौद्ध धर्म के 'सर्वास्तिवादी संप्रदाय' की दीक्षा दी थी। किन्तु बौद्ध अनुश्रुतियों और अशोक के अभिलेखों से यह सिद्ध नहीं होता कि उसने किसी राजनीतिक उद्देश्य से धम्म का प्रचार किया। तेरहवें शिलालेख और लघु शिलालेख से विदित होता है कि अशोक धर्म परिवर्तन का कलिंग के युद्ध से निकट सम्बन्ध है। इतिहासकार रोमिला थापर का मत है कि धम्म कल्पना अशोक की निजी कल्पना थी।
अहिंसा का प्रचार

अशोक ने धम्म प्रचार के लिए बड़ी लगन और उत्साह से काम किया। अहिंसा के प्रचार के लिए अशोक ने कई क़दम उठाए। उसने युद्ध बंद कर दिए और स्वयं को तथा राजकर्मचारियों को मानव-मात्र के नैतिक उत्थान में लगाया। जीवों का वध रोकने के लिए अशोक ने प्रथम शिलालेख में विक्षप्ति जारी की कि किसी यज्ञ के लिए पशुओं का वध न किया जाए।
विदेशों से सम्बन्ध

धम्म प्रचार एवं धम्म विजय के संदर्भ में अशोक के शिलालेखों में कुछ ऐसे विवरण भी मिलते हैं, जिनमें उसके एवं विदेशों के पारस्परिक सम्बन्धों का आभास मिलता है। ये सम्बन्ध कूटनीति एवं भौगोलिक सान्निध्य के हितों पर आधारित थे। अशोक ने जो सम्पर्क स्थापित किए, वे अधिकांशतः दक्षिण एवं पश्चिम क्षेत्रों में थे और धम्म मिशनों के माध्यम से स्थापित किए थे। इन मिशनों की तुलना आधुनिक सदभावना मिशनों से की जा सकती है। अशोक के ये मिशन स्थायी तौर पर विदेशों में एक आश्चर्यजनक तथ्य हैं कि स्तंभ अभिलेख नं. 7, जो अशोक के काल की आख़िरी घोषणा मानी जाती है, ताम्रपर्ण (श्रीलंका) के अतिरिक्त और किसी विदेशी शक्ति का उल्लेख नहीं करती। शायद विदेशों में अशोक को उनती सफलता नहीं मिली जितनी साम्राज्य के भीतर। फिर भी इतना कहा जा सकता है कि विदेशों से सम्पर्क के जो द्वार सिकन्दर के आक्रमण के पश्चात खुले थे, वे अब और अधिक चौड़े हो गए।
यवन, काम्बोज एवं गांधार
मुख्य लेख : यवन, गांधार एवं काम्बोज

खरोष्ठी लिपि

जहाँ तक पश्चिमी शक्तियों का सम्बन्ध है, शिलालेख 5 एवं 13 में यवनों, काम्बोजों एवं गांधारों का उल्लेख है। किन्तु उत्तर-पश्चिम की इन शक्तियों के पश्चिम में भी कुछ ऐसी शक्तियाँ थीं, जो कि सिकन्दर के आक्रमण के बाद स्थापित हो गई थीं और सामान्य रूप से यवन थीं। इनमें से कुछ को अशोक ने नाम लेकर अभिहित किया है। एक स्थान पर अशोक ने कहा है कि- "उसके धम्म मिशन सीमावर्ती राज्यों और 600 योजन जैसे सुदूर क्षेत्रों में भी पहुँचे थे"। शिलालेख 2 एवं 13 में यवन नरेश अंतियोक का उल्लेख है, जोअखमनी शासक एण्टियोकस द्वितीय माना जाता है। कहा जाता है कि अशोक ने विशाल पत्थर पर एक अभिलेख उत्कीर्ण करवाया, जिसकी घोषणाओं की शैली अखमनी प्रारूप से प्रेरित थी। भाषाशास्त्रीय अध्ययन से भी इन सम्पर्कों की पुष्टि होती है। अशोक केशाहबाजगढ़ी एवं मानसेहरा शिलालेखों में खरोष्ठी लिपि का प्रयोग एवं कुछ ईरानी शब्दों का प्रयोग भी इसी ओर संकेत करते हैं।रुद्रदामन के जूनागढ़ अभिलेख में अपरान्त (पश्चिम भारत) में अशोक के गवर्नर के रूप में योनराज तुफ़ास्क का नाम मिलता है, जो स्पष्टतः एक ईरानी नाम है। पश्चिम के ही कुछ अन्य नरेशों के नाम अशोक के शिलालेख नं. 13 में मिलते हैं-
'तुरमाय' अर्थात् 'तुलमाय' - मिस्र का यवन नरेश टाल्मी द्वितीय फिलाडेल्फस (ई. पू. 285-47) था।
'अंतिकितनी' अर्थात् 'अंतेकिन' - मेसिडोनिया का यवन नरेश ऐण्टीगोनस गोनातास (ई. पू. 277-39)।
'मका' अर्थात् 'मगा' - उत्तरी अफ्रीका में सेरीन का यवन नरेश मगा (ई. पू. 282-58)।
'अलिकसुन्दर' - ऐपीरस का यवन नरेश एलेक्ज़ेडर (ई. पू. 272-55) अथवा कोरिन्स का यवन नरेश एलेक्ज़ेडर (ई. पू. 252-44)।

(ये चार नरेश अंतियोक के राज्य के परे बताए जाते हैं।)
दक्षिण



हर दशा में दूसरे सम्प्रदायों का आदर करना ही चाहिए। ऐसा करने से मनुष्य अपने सम्प्रदाय की उन्नति और दूसरे सम्प्रदायों का उपकार करता है। इसके विपरीत जो करता है, वह अपने सम्प्रदाय की (जड़) काटता है और दूसरे सम्प्रदायों का भी अपकार करता है। क्योंकि जो अपने सम्प्रदाय की भक्ति में आकर इस विचार से कि मेरे सम्प्रदाय का गौरव बढ़े, अपने सम्प्रदाय की प्रशंसा करता है और दूसरे सम्प्रदाय की निन्दा करता है, वह ऐसा करके वास्तव में अपने सम्प्रदाय को ही गहरी हानि पहुँचाता है। इसलिए समवाय (परस्पर मेलजोल से रहना) ही अच्छा है अर्थात् लोग एक-दूसरे के धर्म को ध्यान देकर सुनें और उसकी सेवा करें। - सम्राट अशोक महान[1]

देवताओं के प्रिय प्रियदर्शी राजा ऐसा कहते हैं... मैंने यह (प्रबन्ध) किया कि हर समय चाहे मैं खाता होऊँ या अन्तःपुर में रहूँ या गर्भागार (शयनगृह) में होऊँ या टहलता होऊँ या सवारी पर होऊँ या कूच कर रहा होऊँ, सभी जगह किसी भी समय पर, प्रतिवेदक (गुप्तचर) प्रजा का हाल मुझे सुनावें। मैं प्रजा का काम सभी जगह पर करता हूँ।… क्योंकि मैं कितना ही परिश्रम करूँ और कितना ही राजकार्य करुँ मुझे सन्तोष नहीं होता। सब लोगों का हित करना ही मैं अपना प्रधान कर्तव्य समझता हूँ। पर सभी लोगों का हित, परिश्रम और राजकार्य सम्पादन के बिना नहीं हो सकता। सभी लोगों का हित करने से बढ़कर और कोई कार्य नहीं है। जो कुछ भी पराक्रम करता हूँ, वह इसीलिए कि प्राणियों के प्रति जो मेरा ऋण है, उससे उऋण हो जाऊँ… अधिक परिश्रम के बिना यह कार्य कठिन है।- सम्राट अशोक महान[2]




दक्षिण में मौर्य प्रभाव के प्रसार की जो प्रक्रिया चंद्रगुप्त मौर्य के काल में आरम्भ हुई, वह अशोक के नेतृत्व में और भी अधिक पुष्ट हुई। लगता है कि चंद्रगुप्त की सैनिक प्रसार की नीति ने वह स्थायी सफलता नहीं प्राप्त की, जो अशोक की धम्म विजय ने की थी। गावीमठ, पालकी गुण्डु, ब्रह्मगिरि, मास्की, येर्रागुण्डी, जतिंग रामेश्वर आदि स्थलों पर स्थित अशोक के शिलालेख इसके प्रमाण हैं। और फिर परिवर्ती कालीन साहित्य में, विशेष रूप से दक्षिण में अशोकराज की परम्परा काफ़ी प्रचलित प्रतीत होती है। ह्यूनत्सांग ने तो चोल-पाण्ड्य राज्यों में, जिन्हें स्वयं अशोक के शिलालेख 2 एवं 13 में सीमावर्ती प्रदेश बताया गया है, भी अशोकराज के द्वारा निर्मित अनेक स्तूपों का वर्णन किया है। यह सम्भव है कि कलिंग में अशोक की सैनिक विजय और फिर उसके पश्चात उनके सौहार्दपूर्ण नीति ने भोज, पत्तनिक, आँध्रों, राष्ट्रिकों,सतियपुत्रों एवं केरल पुत्रों जैसी शक्तियों के बीच मौर्य प्रभाव के प्रसार को बढ़ाया होगा। अशोक और श्रीलंका के सम्बन्ध पारस्परिक सदभाव, आदर-सम्मान एवं बराबरी पर आधारित थे, न कि साम्राज्यिक शक्ति एवं आश्रित शक्ति के पारस्परिक सम्बन्धों पर।

उपर्युक्त विदेशी शक्तियों के अतिरिक्त कुछ क्षेत्र ऐसे भी हैं, जिनके सम्बन्ध में कुछ परम्पराएँ एवं किंवदन्तियाँ प्राप्त हैं। उदाहरणार्थ कश्मीरसम्भवतः अन्य सीमावर्ती प्रदेशों की तरह ही अशोक के साम्राज्य से जुड़ा था। मध्य एशिया में स्थित खोटान के राज्य के बारे में एक तिब्बती परम्परा है कि बुद्ध की मृत्यु के 250 वर्ष के बाद अर्थात् ई. पू. 236 में अशोक खोटान गया था। सम्भवतः यह भी धम्म मिशन के रूप में हुआ होगा, किन्तु यह दृष्टव्य है कि स्वयं अशोक के अभिलेखों में इसका कोई उल्लेख नहीं है। इसी प्रकार नेपाल का कुछ अंश अशोक की यात्रा के उपलक्ष्य में वहाँ के करों को कम करना किसी विदेशी राज्य में सम्भव नहीं था। फिर भी नेपाल का शेष अंश सम्भवतः मौर्य साम्राज्य से घनिष्ठ सम्बन्ध बनाए हुए होगा।
अशोक शासक के रूप में

शासक संगठन का प्रारूप लगभग वही था, जो चंद्रगुप्त मौर्य के समय में था। अशोक के अभिलेखों में कई अधिकारियों का उल्लेख मिलता है। जैसे राजुकु, प्रादेशिक, युक्तक आदि। इनमें अधिकांश राज्याधिकारी चंद्रगुप्त के समय से चले आ रहे थे। अशोक ने धार्मिक नीति तथा प्रजा के कल्याण की भावना से प्रेरित होकर उनके कर्तव्यों में विस्तार किया। केवल धम्म महामात्रों की नियुक्ति एक नवीन प्रकार की नियुक्ति थी। बौद्ध धर्म ग्रहण करने के पश्चात अशोक ने धम्म प्रचार के लिए बड़ी लगन और उत्साह से काम किया। परन्तु शासन के प्रति वह क़तई उदासीन नहीं हुआ। 40 वर्ष तक राज्य करने के बाद लगभग ई. पू. 232 में अशोक की मृत्यु हुई। उसके बाद लगभग 50 वर्ष तक अशोक के अनेक उत्तराधिकारियों ने शासन किया। किन्तु इन मौर्य शासकों के सम्बन्ध में हमारा ज्ञान अपर्याप्त तथा अनिश्चित है। पुराण,बौद्ध तथा जैन अनुश्रुतियों में इन उत्तराधिकारियों के नामों की जो सूचियाँ दी गई हैं, वे एक-दूसरे से मेल नहीं खाती हैं।
ब्राह्मणों का सम्मान

शिलालेखों में ऐसी पर्याप्त सामग्री मिलती है, जिससे यह सिद्ध होता है कि अशोक ब्राह्मणों का आदर करता था, उनकी भलाई में दिलचस्पी लेता था। वह ब्राह्मणों और श्रमणों को दान देता था। अशोक के पुत्रों तथा ब्राह्मणों के बीच संघर्ष का कोई प्रमाण नहीं मिलता। इसके विपरीत यदि कश्मीर के ब्राह्मण इतिहासकार कल्हण पर विश्वास किया जाए तो अशोक के उत्तराधिकारी 'जलौक' और ब्राह्मणों के सम्बन्ध नितांत मैत्रीपूर्ण थे। पुष्यमित्र शुंग का मौर्य साम्राज्य का सेनापति नियुक्त किया जाना ही एक प्रबल प्रमाण है कि मौर्यों की नीति ब्राह्मण विरोधी नहीं थी।
अशोक की शान्तिप्रियता तथा अहिंसा

हेमचंद्र रायचौधरी के अनुसार अशोक की शान्तिप्रियता तथा अहिंसा की नीति साम्राज्य के पतन का कारण बनी। कलिंग युद्ध के बाद साम्राज्य की सेना का सामरिक उत्साह ठंडा पड़ गया। अशोक ने अशोक ने युद्ध विजय की नीति को त्यागकर धम्म विजय की नीति अपना ली। इससे भी साम्राज्य की शक्ति क्षीण हुई। उसने अपने पुत्रों को विलय और रक्तपात न करने का उपदेश दिया। उसके उत्तराधिकारी 'भेरिघोष' की अपेक्षा 'धम्म घोष' से अधिक परिचित थे। सेना से राजाओं का सम्पर्क कम रहा। वे देश की एकता को विघटित होने से बचा न सके। राजाओं का सेना से कितना कम सम्पर्क था यह इस बात से स्पष्ट है कि पुष्यमित्र शुंग ने सेना के ही समक्ष अन्तिम मौर्य शासक बृहद्रथ का वध किया।

कई इतिहासकार हेमचन्द्र रायचौधरी के इस मत से सहमत नहीं हैं। नीलकंठ शास्त्री के अनुसार अशोक की शान्तिप्रियता में कट्टरता नहीं थी। वह मानवीय स्वभाव की जटिलता से अच्छी तरह परिचित था और इसलिए उसने शान्तिप्रियता और युद्धत्याग की नीति को सीमा के अन्दर ही नियंत्रित रखा। इसका कोई प्रमाण नहीं है कि अशोक ने सेना भंग कर दी। तेरहवें शिलालेख में अशोक ने आटविक जातियों को जो चेतावनी दी है, उससे स्पष्ट है कि क्षमाशील होते हुए भी वह अवसर पड़ने पर इन आटविक जातियों को उचित दंड देने से हिचकता नहीं था। यह आटविक राज्यों को एक शक्तिशाली राजा की चेतावनी है, जिसे अपनी सैन्यशक्ति पर विश्वास है। अशोक की नीति व्यावहारिक थी। इसीलिए उसने कलिंग को स्वतंत्र नहीं किया। उसकी अहिंसा की नीति भी व्यावहारिक थी।
अशोक के बाद

पुराणों के अनुसार अशोक के बाद 'कुणाल' गद्दी पर बैठा। 'दिव्यावदान' में उसे 'धर्मविवर्धन' कहा गया है, किन्तु अशोक के और भी पुत्र थे। 'राजतरंगिणी' के अनुसार जलौक कश्मीर का स्वतंत्र शासक बन गया। तारनाथ के अनुसार 'वीरसेन' अशोक का पुत्र था, जो गांधार का स्वतंत्र शासक बन गया। इस प्रकार हम देखते हैं कि अशोक की मृत्यु के बाद ही साम्राज्य का विघटन हो गया। कुणाल अंधा था, अतः वह शासन कार्य में असमर्थ था। जैन तथा बौद्ध ग्रंथों के अनुसार शासन की बाग़डोर उसके पुत्र संप्रति के हाथ में थी। इन अनुश्रुतियों के अनुसार संप्रति ही कुणाल का उत्तराधिकारी था। पुराणों तथा नागार्जुनी पहाड़ियों की गुफ़ाओं के शिलालेख के अनुसार 'दशरथ' कुणाल का पुत्र था। नागार्जुनी गुफ़ाओं को दशरथ ने आजीविकों को दान में दिया था। इन प्रमाणों के आधार पर यह मत प्रस्तुत किया गया कि मगध साम्राज्य दो भागों में विभक्त हो गया। दशरथ का अधिकार साम्राज्य के पूर्वी भाग में तथा संप्रति का पश्चिमी भाग में था। 'विष्णु पुराण' तथा 'गार्गी संहिता' के अनुसार संप्रति तथा दशरथ के बाद उल्लेखनीय मौर्य शासक 'सालिसुक' था। उसे संप्रति का पुत्र बृहस्पति भी माना जा सकता है। पुराणों में ही नहीं वरन 'हर्षचरित' में भी मगध के अन्तिम सम्राट का नाम 'बृहद्रथ' दिया गया है। इनके अनुसार मौर्य वंश के अन्तिम सम्राट बृहद्रथ की, उसके सेनापति पुष्यमित्र ने हत्या कर दी और स्वयं सिंहासन पर आरूढ़ हो गया।
महेन्द्र और पुत्री संघमित्रा

अशोक ने बौद्ध धर्म ग्रहण किया, इस धर्म के उपदेशों को न केवल देश में वरन विदेशों में भी प्रचारित करने के लिए प्रभावशाली क़दम उठाए। अपने पुत्र महेन्द्र और पुत्री संघमित्रा को अशोक ने इसी कार्य के लिए श्रीलंका भेजा था। अशोक ने अपने कार्यकाल में अनेक शिलालेख खुदवाए जिनमें धर्मोपदेशों को उत्कीर्ण किया गया। राजशक्ति को सर्वप्रथम उसने ही जनकल्याण के विविध कार्यों की ओर अग्रसर किया। अनेक स्तूपों और स्तंभों का निर्माण किया गया। इन्हीं में से सारनाथ का प्रसिद्ध सिंहशीर्ष स्तंभ भी है जो अब भारत के राजचिह्न के रूप में सम्मानित है।
अशोक की सहृदयता, सहिष्णुता और उदारता

कुछ इतिहासकारों का मत है कि अशोक ने धार्मिक क्षेत्रों की ओर ध्यान न देकर राष्ट्रीय दृष्टि से हित साधन नहीं किया। इससे भारत का राजनीतिक विकास रूका जबकि उस समय रोमन साम्राज्य के समान विशाल भारतीय साम्राज्य की स्थापना संभव थी। इस नीति से दिग्विजयी सेना निष्क्रिय हो गई और विदेशी आक्रमण का सामना नहीं कर सकी। इस नीति ने देश को भौतिक समृद्धि से विमुख कर दिया जिससे देश में राष्ट्रीयता की भावनाओं का विकास अवरुद्ध हो गया। दूसरी ओर अन्य का मत इससे विपरीत है। वे कहते हैं इसी नीति से भारतीयता का अन्य देशों में प्रचार हुआ। घृणा के स्थान पर सहृदयता विकसित हुई, सहिष्णुता और उदारता को बल मिला तथा बर्बरता के कृत्यों से भरे हुए इतिहास को एक नई दिशा का बोध हुआ। लोकहित की दृष्टि से अशोक ही अपने समकालीन इतिहास का एकमात्र ऐसा शासक है जिसने न केवल मानव की वरन जीवमात्र की चिंता की। इस मत-विभिन्नता के रहते हुए भी यह विचार सर्वमान्य है कि अशोक अपने काल का अकेला सम्राट था, जिसकी प्रशस्ति उसके गुणों के कारण होती आई है बल के डर से नहीं।
मौर्य साम्राज्य के पतन के कारण
मुख्य लेख : मौर्य साम्राज्य का पतन

अशोक के बाद ही मौर्य साम्राज्य का पतन आरम्भ हो गया था और लगभग 50 वर्ष के अन्दर इस साम्राज्य का अंत हो गया। इतने अल्प समय में इतने बड़े साम्राज्य का नष्ट हो जाना एक ऐसी घटना है कि इतिहासकारों में साम्राज्य विनाश के कारणों की जिज्ञासा स्वाभाविक ही है।

महामहोपाध्याय हरप्रसाद शास्त्री ने अशोक की धार्मिक नीति को साम्राज्य के पतन का मुख्य कारण माना है। उसके अनुसार अशोक की धार्मिक नीति बौद्धों के पक्ष में थी और ब्राह्मणों के विशेषाधिकारों व उनकी सामाजिक श्रेष्ठता की स्थिति पर कुठाराघात करती थी। अतः ब्राह्मणों में प्रतिक्रिया हुई, जिसकी चरमसीमा पुष्यमित्र के विद्रोह में दृष्टिगोचर होती है। इस मत का सफलतापूर्वक विरोध करते हुए प्रसिद्ध इतिहासकार हेमचंद्र रायचौधरी का कहना है कि एक तो अशोक ने पशुबलि पर पूर्ण प्रतिबंध लगाया नहीं था और फिर स्वयं ब्राह्मण ग्रंथों में भी यज्ञादि अवसरों पर पशु-बलि के विरोध के स्वर स्पष्ट सुनाई दे रहे थे। अतः अशोक के तथाकथित प्रतिबंध को बढ़ा-चढ़ा कर दिखाया गया है। धम्ममहामात्रों के दायित्वों में ऐसा कोई उल्लेख नहीं है, जिसे ब्राह्मण विरोधी कहा जाए। वे तो ब्राह्मण, श्रमण आदि सभी के कल्याण के लिए थे। राजुकों जैसे न्यायाधिकारियों को जो अधिकार दिए गए वे भी ब्राह्मणों के अधिकारो पर आघात करने के उद्देश्य से नहीं अपितु दंड विधान को लोकहित एवं अधिक मानवीय बनाने के उद्देश्य से प्रेरित थे और न ही सेनानी पुष्यमित्र शुंग के विद्रोह को ब्राह्मणों द्वारा संगठित क्रान्ति कहना उचित होगा। यह तो सैनिक क्रान्ति थी, जिसमें धर्म का पुट नहीं था। ऐसे कोई प्रमाण नहीं हैं जिनके आधार पर यह कहा जा सके कि पुष्यमित्र की राज्यक्रान्ति का कारण सेना पर पूर्ण अधिकार रखने वाले सेनापति की महत्त्वाकांक्षा थी, असंतुष्ट ब्राह्मणों के एक समुदाय का नेतृत्व नहीं।
मौर्यकालीन भारत
मुख्य लेख : मौर्यकालीन भारत

मौर्य साम्राज्य की सामाजिक आर्थिक, शासन प्रबंन्ध तथा धर्म और कला सम्बन्धी जानकारी के लिए कौटिल्य का अर्थशास्त्र, मैगस्थनीज़ कृत इंडिका तथा अशोक के अभिलेखों का ठीक से अर्थ लगाया जाए तो पता चलेगा कि वे एक दूसरे के पूरक हैं। रुद्रदामन के जूनागढ़ शिलालेख से भी प्रान्तीय शासन के सम्बन्ध में महत्त्वपूर्ण जानकारी प्राप्त होती है। मौर्य काल की जानकारी के लिए अर्थशास्त्र की प्रामाणिकता के सम्बन्ध में विद्वानों में मतभेद है। परम्परागत धारणा के आधार पर इसे चंद्रगुप्त मौर्य के मंत्री चाणक्य (विष्णुगुप्त) द्वारा रचित मानकर ई. पू. चौथी शताब्दी का बताया जाता है। किन्तु वैज्ञानिक ढंग से किए गए आधुनिक शोध ने इस मत के प्रति आशंका व्यक्त की है। इस संदर्भ में ट्रांटमैन के शोधकार्य का उल्लेख अनुचित न होगा। अर्थशास्त्र की शैली के सांख्यकीय विश्लेषण द्वारा उन्होंने स्पष्ट किया है कि इसकी रचना एक युग विशेष में नहीं अपितु विभिन्न शताब्दियों में हुई और इसीलिए यह किसी व्यक्ति विशेष की रचना न होकर विभिन्न हाथों की कृति है। जहाँ कुछ अध्याय मौर्य काल के हैं वहाँ अधिकांश अध्याय ऐसे भी हैं जो तीसरी, चौथी शताब्दी ईस्वी में रचे गए।
मौर्ययुगीन पुरातात्विक संस्कृति
मुख्य लेख : मौर्ययुगीन पुरातात्विक संस्कृति

मौर्ययुगीन पुरातात्विक संस्कृति में उत्तरी काली पॉलिश के मृदभांडों की जिस संस्कृति का प्रादुर्भाव महात्मा बुद्ध के काल में हुआ था, वह मौर्य युग में अपनी चरम सीमा पर दृष्टिगोचर होती है। इस संस्कृति का विवरण उत्तर, उत्तर पश्चिम, पूर्व एवं दक्कन के विहंगम क्षेत्र में इसका प्रसार हो चुका था। उत्तर पश्चिम में कंधार, तक्षशिला, उदेग्राम आदि स्थलों से लेकर पूर्व में चंद्रकेतुगढ़ तक, उत्तर में रोपड़, हस्तिनापुर, तिलौराकोट एवं श्रावस्ती से लेकर दक्षिण में ब्रह्मपुरी, छब्रोली आदि तक इस संस्कृति के अवशेष मिलते हैं। पालि एवं संस्कृत ग्रंथों में कौशांबी, श्रावस्ती, अयोध्या, कपिलवस्तु, वाराणसी, वैशाली, राजगीर, पाटलिपुत्र आदि जिन नगरों का उल्लेख मिलता है, वे सभी मौर्य युग में पर्याप्त पल्लवित अवस्था में थे।
मौर्यकाल में दास प्रथा
मुख्य लेख : मौर्यकाल में दास प्रथा
मेंगस्थनीज़ ने लिखा है कि सभी भारतवासी समान हैं और उनमें कोई दास नहीं है।
डायोडोरस ने लिखा है, "क़ानून के अनुसार उनमें से कोई भी किसी भी परिस्थिति में दास नहीं हो सकता।"
मेगस्थनीज़ को ही उद्धृत करते हुए स्ट्राबों का कहना है, "भारतीयों में किसी ने अपनी सेवा में दास नहीं रखे।"
एक अन्य स्थल पर स्ट्राबो ने कहा, "चूँकि उनके पास दास नहीं हैं, अतः उन्हें बच्चों की अधिक आवश्यकता होती है।

विदेशी शक्तियों के वक्तव्यों का शब्दशः स्वीकार नहीं किया जा सकता। क्योकि कम से कम बुद्ध के काल से ही दासों को उत्पादन के काम में लगाया जाता था और पालि त्रिपिटक में इसके असंख्य उल्लेख हैं। अतः उपर्युक्त विवरणों की व्याख्या विभिन्न प्रकार से की जा सकती है। हो सकता है कि मेगस्थनीज़ को भारत में दासों के प्रति स्वामियों के द्वारा व्यवहार निर्मल और सदभावनापूर्ण लगा हो अथवा यह भी सम्भव है कि उसने किसी विशेष क्षेत्र का ही उल्लेख किया हो। एक स्थान पर तो कौटिल्य ने लिखा है कि न त्वेवार्यस्य दासावः, अर्थात किसी भी परिस्थिति में आर्य के लिए दासता नहीं होगी। इस संदर्भ में मेगस्थनीज़ के कथन का यह अर्थ हो सकता है कि स्वतंत्र लोगों को आजीवन दासता में परिणत करने की सीमाएँ थीं।
मौर्य काल का शासन प्रबंध
मुख्य लेख : मौर्य काल का शासन प्रबंध

मौर्यों के शासनकाल में भारत ने पहली बार राजनीतिक एकता प्राप्त की। 'चक्रवर्ती सम्राट' का आदर्श चरितार्थ हुआ। कौटिल्य ने चक्रवर्ती क्षेत्र को साकार रूप दिया। उसके अनुसार चक्रवर्ती क्षेत्र के अंतर्गत हिमालय से हिन्द महासागर तक सारा भारतवर्ष है। मौर्य युग में राजतंत्र के सिद्धांत की विजय है। इस युग में गण राज्यों का ह्रास होने लगा और शासन सत्ता अत्यधिक केन्द्रित हो गई। साम्राज्य की सीमा पर तथा साम्राज्य के अंदर कुछ अर्ध—स्वतंत्र राज्य थे, जैसे काम्बोज, भोज, पैत्तनिक तथा आटविक राज्य।

मौर्य काल में प्रजा की शक्ति में अत्यधिक वृद्धि हुई। परम्परागत राजशास्त्र सिद्धांत के अनुसार राजा धर्म का रक्षक है, धर्म का प्रतिपादक नहीं। राजशासन की वैधता इस बात पर निर्भर थी कि वह धर्म के अनुकूल हो। किन्तु कौटिल्य ने इस दिशा में एक नया प्रतिमान प्रस्तुत किया।
मौर्यकालीन धर्म

वैदिक धर्म और गृह कृत्य प्रधान थे। मेगस्थनीज़ के अनुसार ब्राह्मणों का समाज में प्रधान स्थान था। दार्शनिक यद्यपि संख्या में कम थे किन्तु वे सबसे श्रेष्ठ समझे जाते थे और यज्ञ—कार्य में लगाए जाते थे। कौटिल्य के अनुसार त्रयी (अर्थात् तीन वेदों) के अनुसार आचरण करते हुए संसार सुखी रहेगा और अवसाद को प्राप्त नहीं होगा। तदनुसार राजकुमार के लिए चोलकर्म, उपनयन, गोदान, इत्यादि वैदिक संस्कार निर्दिष्ट किए गए हैं। ऋत्विक, आचार्य और पुरोहित को राज्य से नियत वार्षिक वेतन मिलता था। वैदिक ग्रंथों और कर्मकाण्ड का उल्लेख प्रायः तत्कालीन बौद्ध ग्रंथों में मिलता है। कुछ ब्राह्मणों को जो वेदों में निष्णात थे, वेदों की शिक्षा देते थे तथा बड़े—बड़े यज्ञ करते थे, पालि—ग्रंथों में 'ब्राह्मणनिस्साल' कहा गया है। वे अश्वमेध,वाजपेय इत्यादि यज्ञ करते थे। ऐसे ब्राह्मणों को राज्य से कर—मुक्त भूमि दान में मिलती थी। अर्थशास्त्र में ऐसी भूमि को 'ब्रह्मदेय' कहा गया है और इन यज्ञों की इसलिए निंदा की गई है कि इनमें गौ और बैल का वध होता था, जो कृषि की दृष्टि से उपयोगी थे।

किन्तु कर्मकाण्ड प्रधान वैदिक धर्म अभिजात ब्राह्मण तथा क्षत्रियों तक ही सीमित था। उपनिषदों का अध्यात्म—जीवन, चिन्तन तथा मनन का आदर् ख़त्म नहीं हुआ था। सुत्त निपात में ऐसे ऋषियों का उल्लेख है जो पंचेन्द्रिय सुख को त्यागकर इद्रियसंयम रखते थे। विद्या और पवित्रता ही इसका धन था। वे भिक्षा में मिलने वाले व्रीहि से यज्ञ करते थे। यूनानी लेखकों ने भी इन वानप्रस्थियों का उल्लेख किया है। इन लेखकों के अनुसार ये वानप्रस्थाश्रम में रहने वाले ब्राह्मण कुटियों में निवास करते थे। वहाँ संयम का जीवन—व्यतीत करते हुए विद्याध्ययन और मनन करते थे। वे अपना समय गहन प्रवचनों को सुनने और विद्या दान में बिताते थे। मेगस्थनीज़ ने मंडनि कौर सिकन्दर के बीच वार्तालाप का जो वृतान्त दिया है, उससे मौर्यकालीन ब्राह्मण ऋषियों की जीवनचर्या पर प्रकाश पड़ता है।

वैदिक धर्म के अतिरिक्त एक अन्य प्रकार के धार्मिक जीवन का चित्र भी मिलता है जिसकी मुख्य विशेषता विभिन्न देवताओं की पूजा थी। ब्रह्मा, इन्द्र, यम, वरुण, कुबेर, शिव, कार्तिकेय, संकर्षण, जयंत, अपराजित, इत्यादि देवताओं का उल्लेख है। इनमें से बहुत से देवताओं के मन्दिर थे। स्थानीय तथा कुल देवताओं के मन्दिर भी होते थे। इन देवताओं की पूजा पुष्प तथा सुगन्धित पदार्थों से होती थी। नमस्कार, प्रणतिपात या उपहार से देवताओं को संतुष्ट किया जाता था। इन मन्दिरों में मेले और उत्सव होते थे। यह जन—साधारण का धर्म था। देवताओं की पूजा के साथ भूत—प्रेत तथा राक्षसों के अस्तित्व में उनका विश्वास था। इन्हें अभिचार विद्या में कुशल व्यक्तियों की सहायता से संतुष्ट किया जाता था। इसके अतिरिक्त अनेक प्रकार के जादू—टोनों का भी प्रयोग किया जाता था। अक्षय धन, राजकृपा, लम्बी आयु, शत्रु का नाश आदि उद्देश्यों को प्राप्त करने के लिए अनेक अभिचार क्रियाएँ की जाती थीं। चैत्यवृक्षों तथा नागपूजा का प्रचलन जन—साधारण में था। अशोक ने भी अपने नवें शिलालेख में लोगों द्वारा किए जाने वाले मांगलिक कार्यों का उल्लेख किया है। ये मांगलिक कार्य बीमारी के समय, विवाह, पुत्रोत्पत्ति तथा यात्रा के अवसर पर किए जाते थे।

अशोक ने अपने शिलालेखों में ब्राह्मणों, निर्ग्रन्थों के साथ—साथ आजीवकों का भी उल्लेख किया है। राज्याभिषेक के 12वें वर्ष में अशोक ने बाराबर की पहाड़ियों में उन्हें दो गुफ़ाएँ प्रदान कीं। सम्पूर्ण मौर्य काल में आजीवकों का प्रभाव बना रहा। अशोक के पौत्र दशरथ ने भी नागार्जुनी की पहाड़ियों में कुछ गुफ़ाएँ आजीवकों को भेंट कीं।
मौर्यकालीन कला
मुख्य लेख : मौर्यकालीन कला

कला की दृष्टि से हड़प्पा की सभ्यता और मौर्यकाल के बीच लगभग 1500 वर्ष का अंतराल है। इस बीच की कला के भौतिक अवशेष उपलब्ध नहीं है। महाकाव्यों और बौद्ध ग्रंथों में हाथीदाँत, मिट्टी और धातुओं के काम का उल्लेख है। किन्तु मौर्यकाल से पूर्व वास्तुकला और मूर्तिकला के मूर्त उदाहरण कम ही मिलते हैं। मौर्यकाल में ही पहले—पहल कलात्मक गतिविधियों का इतिहास निश्चित रूप से प्रारम्भ होता है। राज्य की समृद्धि और मौर्य शासकों की प्रेरणा से कलाकृतियों को प्रोत्साहन मिला। इस युग में कला के दो रूप मिलते हैं। एक तो राजरक्षकों के द्वारा निर्मित कला, जो कि मौर्य प्रासाद और अशोक स्तंभों में पाई जाती है। दूसरा वह रूप जो परखम के यक्ष दीदारगंज की चामर ग्राहिणी और वेसनगर की यक्षिणी में देखने को मिलता है।



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