मंगलवार, 8 मार्च 2016

भारतीय इतिहास प्रश्न हिन्दी में



टीपू सुल्तान ने अंग्रेज़ों के साथ युद्ध करते हुए कब वीरगति प्राप्त की?
1857 ई.
1793 ई.
1799 ई.
1769 ई.
टीपू सुल्तान
'टीपू सुल्तानभारतीय इतिहास में 'शेर-ए-मैसूर' के नाम से प्रसिद्ध है। वह प्रसिद्ध योद्धा हैदर अली का पुत्र था। हैदर अली की मृत्यु के बाद पुत्र टीपू सुल्तान ने मैसूर की सेना की कमान संभाली थी। टीपू अपने पिता की ही भांति योग्य एवं पराक्रमी था। 'मैसूर की तीसरी लड़ाई' में भी जब अंग्रेज़ टीपू सुल्तान को नहीं हरा पाए, तो उन्होंने मैसूर के इस शेर से 'मेंगलूर की संधि' नाम से एक समझौता किया। लेकिन 'फूट डालो और शासन करो' की नीति चलाने वाले अंग्रेज़ों ने संधि करने के कुछ समय बाद ही टीपू से गद्दारी कर डाली। ईस्ट इंडिया कंपनी ने हैदराबाद के साथ मिलकर चौथी बार टीपू पर ज़बर्दस्त हमला किया और आख़िरकार '4 मई, सन् 1799 ई.' को मैसूर का शेर श्रीरंगपट्टनम की रक्षा करते हुए शहीद हुआ।ध्यान देंअधिक जानकारी के लिए देखें:-टीपू सुल्तान

2.बुद्ध में वैराग्य भावना किन चार दृश्यों के कारण बलवती हुई?
बूढ़ा, रोगी, मृतक, सन्न्यासी
अन्धा, रोगी, लाश, सन्न्यासी
लंगड़ा, रोगी, लाश, सन्न्यासी
युवा, रोगी, लाश, सन्न्यासी
अभिलिखित अभय मुद्रा में बुद्ध
गौतम बुद्ध का मूल नाम 'सिद्धार्थ' था। वे राजा शुद्धोदन और महामाया के पुत्र थे। शुद्धोदन ने सिद्धार्थ को चक्रवर्ती सम्राट बनाना चाहा, उसमें क्षत्रियोचित गुण उत्पन्न करने के लिये समुचित शिक्षा आदि का प्रबंध भी किया, किंतु सिद्धार्थ सदा किसी चिंता में डूबे दिखाई देते थे। अंत में पिता ने उन्हें विवाह बंधन में बांध दिया। एक दिन जब सिद्धार्थ रथ पर भ्रमण के लिये निकले तो उन्होंने मार्ग में जो कुछ भी देखा, उसने उनके जीवन की दिशा ही बदल डाली। एक बार एक दुर्बल वृद्ध व्यक्ति को, एक बार एक रोगी को और एक बार एक शव को देख कर वे संसार से और भी अधिक विरक्त तथा उदासीन हो गये। एक अन्य अवसर पर उन्होंने प्रसन्नचित्त सन्न्यासी को देखा। उसके चेहरे पर शांति और तेज़ की अपूर्व चमक विराजमान थी। इस दृश्य को देखकर सिद्धार्थ अत्यधिक प्रभावित हुए और उनके मन में वैराग्य की भावना बलवती हो उठी।ध्यान देंअधिक जानकारी के लिए देखें:-बुद्ध

3.सम्राट अशोक की वह कौन-सी पत्नी थी, जिसने उसे सबसे ज़्यादा प्रभावित किया था?
चंडालिका
चारुलता
गौतमी
कारुवाकी
भारतीय संविधान की मूल सुलेखित प्रतिलिपि में प्रदर्शित अशोक के चित्र की प्रतिलिपि
'सम्राट अशोक' को अपने विस्तृत साम्राज्य के बेहतर कुशल प्रशासन तथा बौद्ध धर्म के प्रचार के लिए जाना जाता है। जीवन के उत्तरार्ध में अशोक गौतम बुद्ध का भक्त हो गया था। कतिपय लेखों में उसके नज़दीकी रिश्तेदारों के नाम भी दिये गये हैं। इनमें उसकी दूसरी रानी कारुवाकी और उसके पुत्र तीवर के उल्लेख हैं। एक बाद के लेख में अशोक के पोते दशरथ का नाम आया है। अशोक के लेखों में और जनश्रुतियों में भी अशोक की कई पत्नियाँ होने का उल्लेख है। सिंहली अनुश्रुतियों के अनुसार उसकी पहली पत्नी का नाम 'देवी' था, जो वेदिसगिरि के एक धनी श्रेष्ठी की पुत्री थी। अशोक ने उसके साथ तब विवाह किया, जब वह उज्जैन में वाइसराय था।ध्यान देंअधिक जानकारी के लिए देखें:-अशोक का परिवारसम्राट अशोक

4.निम्नलिखित में से सबसे प्राचीन राजवंश कौन-सा है?
मौर्य वंश
गुप्त वंश
कुषाण वंश
कण्व वंश
चंद्रगुप्त मौर्य का सभा गृह
चंद्रगुप्त मौर्य की माता का नाम 'मुरा' था। इसी से यह वंश 'मौर्य वंश' कहलाया। चंद्रगुप्त के बाद उसके पुत्र बिंदुसार ने 298 ई.पू. से 273 ई. पू. तक राज्य किया। बिंदुसार के बाद उसका पुत्र अशोक 273 ई.पू. से 232 ई.पू. तक गद्दी पर रहा। अशोक के समय में कलिंग का भारी नरसंहार हुआ, जिससे द्रवित होकर उसने बौद्ध धर्म ग्रहण कर लिया। 316 ईसा पूर्व तक मौर्य वंश ने पूरे उत्तरी पश्चिमी भारत पर अधिकार कर लिया था। अशोक के राज्य में मौर्य वंश का बेहद विस्तार हुआ।ध्यान देंअधिक जानकारी के लिए देखें:-मौर्य वंशचंद्रगुप्त मौर्य

5.अशोक के शिलालेखों को पढ़ने वाला प्रथम अंग्रेज़ कौन था?
जॉन टावर
जेम्स प्रिंसेप
हैरी स्मिथ
चार्ल्स मैटकॉफ़
अशोक शिलालेख, धौली
मौर्य सम्राट अशोक के इतिहास की सम्पूर्ण जानकारी उसके अभिलेखों से मिलती है। यह माना जाता है कि अशोक को अभिलेखों की प्रेरणा ईरान के शासक 'डेरियस' से मिली थी। अशोक के लगभग 40 अभिलेख प्राप्त हुए हैं। ये ब्राह्मीखरोष्ठी और आर्मेइक-ग्रीक लिपियों में लिखे गये हैं। सम्राट अशोक के ब्राह्मी लिपि में लिखित सन्देश को सर्वप्रथम एलेग्जेंडर कनिंघम के सहकर्मी जेम्स प्रिंसेप ने पढ़ा था। शिलालेखों और स्तम्भ लेखों को दो उपश्रेणियों में रखा जाता है। 14 शिलालेख सिलसिलेवार हैं, जिनको 'चतुर्दश शिलालेख' कहा जाता है। ये शिलालेख शाहबाजगढ़ीमानसेराकालसीगिरनार,सोपाराधौली और जौगढ़ में मिले हैं।ध्यान देंअधिक जानकारी के लिए देखें:-अशोक के शिलालेख

6.'श्रीनगर' की स्थापना किस शासक ने की थी?
बिन्दुसार
स्कन्दगुप्त
अशोक
दशरथ
अशोक का स्तम्भ, वैशाली
'अशोक' प्राचीन भारत के मौर्य सम्राट बिंदुसार का पुत्र था, जिसका जन्म लगभग 304 ई. पूर्व में माना जाता है। भाइयों के साथ हुए गृह-युद्ध के बाद 272 ईसा पूर्व अशोक को राजगद्दी मिली और 232 ईसा पूर्व तक उसने शासन किया। आरंभ में अशोक भी अपने पितामह चंद्रगुप्त मौर्य और पिता बिंदुसार की भाँति युद्ध के द्वारा साम्राज्य विस्तार करता चला गया। कश्मीरकलिंग तथा कुछ अन्य प्रदेशों को जीतकर उसने संपूर्ण भारत में अपना साम्राज्य स्थापित कर लिया था, जिसकी सीमाएँ पश्चिम में ईरान तक फैली हुई थीं। दक्षिण में मौर्य प्रभाव के प्रसार की जो प्रक्रिया चंद्रगुप्त मौर्य के काल में आरम्भ हुई थी, वह अशोक के नेतृत्व में और भी अधिक पुष्ट हुई।ध्यान देंअधिक जानकारी के लिए देखें:-अशोक

7.निम्न में से किसने अपनी राजधानी मुर्शिदाबाद से मुंगेर स्थानान्तरित की?
अलीवर्दी ख़ाँ
सिराजुद्दौला
मीर ज़ाफ़र
मीर क़ासिम
मीर क़ासिम
'मीर क़ासिम' 1760 ई. से 1764 ई. तक बंगाल का नवाब रहा था। उसका पूरा नाम 'मीर मुहम्मद क़ासिम अली ख़ान' था। मीर क़ासिम को ब्रिटिश 'ईस्ट इंडिया कम्पनी' की सहायता से नवाब बनाया गया था। शासन कार्यों में मीर क़ासिम, मीर ज़ाफ़र से अधिक योग्य तथा अधिक दृढ़ व्यक्ति था। उसने मालगुज़ारी की वसूली के नियम अधिक कठोर बना दिए और राज्य की आय लगभग दूनी कर दी। उसने फ़ौज का भी संगठन किया और कलकत्ता(वर्तमान कोलकाता) के अनुचित हस्तक्षेप से अपने को दूर रखने के लिए राजधानी मुर्शिदाबाद से उठाकर मुंगेर ले गया।ध्यान देंअधिक जानकारी के लिए देखें:-मीर क़ासिम

8.किस ग्रन्थ में शूद्रों के लिए आर्य शब्द का प्रयोग हुआ है?
अर्थशास्त्र
मुद्राराक्षस
अष्टाध्यायी
वृहत्कथामंजरी

9.पुरुषपुर’ निम्नलिखित में से किसका प्राचीन नाम था?
पटना
पाटलिपुत्र
पेशावर
पंजाब
बाला हिसार क़िला, पेशावर
'पेशावर' पाकिस्तान का एक प्रमुख शहर है। प्राचीन समय में पेशावर का नाम 'पुरुषपुर' हुआ करता था। ऐतिहासिक परम्परा के अनुसार सम्राट कनिष्क ने 'पुरुषपुर' को द्वितीय शती ई. में बसाया था और सर्वप्रथम कनिष्क के बृहत साम्राज्य की राजधानी बनने का सौभाग्य भी इसी नगर को प्राप्त हुआ था। पुरुषपुर प्राचीन समय में 'गाँधार मूर्तिकला' का मुख्य और ख्याति प्राप्त केन्द्र माना जाता था। तृतीय बौद्ध संगीति कनिष्क के शासन काल में पुरुषपुर में ही हुई थी। जबकि कुछ विद्वानों के मत में यह 'बौद्ध संगीति' कुंडलवन, कश्मीर में हुई थी। इसके सभापति आचार्य अश्वघोष थे, जिन्हें कनिष्क पाटलिपुत्र की विजय के पश्चात् अपने साथ पुरुषपुर ले आया था।ध्यान देंअधिक जानकारी के लिए देखें:-पेशावर

10.गुप्तकाल के सिक्कों का सबसे बड़ा ढेर कहाँ से प्राप्त हुआ है?
'बयाना' (भरतपुर) से
'देवगढ़' (झाँसी) से
'भूमरा' (मध्य प्रदेश) से
'तिगवा' (मध्य प्रदेश) से
चन्द्रगुप्त मौर्य
'बयाना' राजस्थान के भरतपुर ज़िले में स्थित एक महत्त्वपूर्ण स्थान है। इस स्थान का प्राचीन नाम 'बाणपुर' कहा जाता है। इसके अतिरिक्त इसके अन्य नाम 'वाराणसी', 'श्रीप्रस्थ' या 'श्रीपुर' भी उपलब्ध हैं। 'ऊखा मन्दिर' से प्राप्त 956 ई. के एक अभिलेख से ज्ञात होता है कि यहाँ का राजा उस समयलक्ष्मण सेन था। बयाना से 1821 ई. में सोने के सिक्कों का भारी ढेर प्राप्त हुआ है, जो गुप्तकालीन हैं। इससे गुप्त शासकों की आर्थिक समृद्धि का प्रमाण मिलता है। इनमें अधिक सिक्के चन्द्रगुप्त द्वितीय के हैं। इन सिक्कों में कई नये प्रकार के सिक्के हैं, जो गुप्त शासकों की विविधता प्रमाणित करते हैं। इन सिक्कों से गुप्तवंशीय कुमारगुप्त द्वितीय के इतिहास पर नया प्रकाश पड़ता है। अनुमान लगाया है कि लगभग 540 ई. के आस-पास हूणों के आक्रमण के समय इस खज़ाने को ज़मीन में गाड़ दिया गया था।ध्यान देंअधिक जानकारी के लिए देखें:-बयाना



























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