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शनिवार, 21 जुलाई 2018

War of the Indian History

War of the Indian History

ई.पू.
३२६ हाईडेस्पीज का युद्ध : सिकंदर और पंजाब के राजा पोरस के बीच जिसमे सिकंदर की विजय हुई | २६१ कलिंग की लड़ाई : सम्राट अशोक ने कलिंग पर आक्रमण किया था और युद्ध के रक्तपात से विचलित होकर उन्होंने युद्ध vowed to do | AD 712 - Battle of Sindh Muhammad Qasim, set the power of the Arabs | 1,191th - Train of the First War - Mohammad Ghori and Prithvi Raj Chauhan was among | Chauhan's victory | 1192 - Train of the Second war - between Mohammed Ghori and Prithviraj Chauhan | The victory of Mohammad Ghauri | 1194 - War of Chandavar - it Jaychand Muhammad Ghori defeated the king of Kannauj | 1526 - First Battle of Panipat -between the Mughal Emperor Babur and Ibrahim Lodi | in 1527 - Battle of Khanwa - The Babur defeated Rana Sanga | 1,529 - skirt the war - the Afghans led by Babur defeated Mahmud Lodhi | 1539 - War of chausa - Humayu defeated by Sher Shah Suri in | 1,540 - Kannauj (Bilgram the war): the re-Sher Shah Suri defeated Humayun and forced to leave India | 1556 - Second Battle of Panipat: between Akbar and Hemu | in 1565 - Talikota of the war: the war to an end by the Vijayanagar Empire Because the Bijapur, Bidar, Ahmednagar and Golconda organized army fought | 1,576 - turmeric Valley War: between Akbar and Rana Pratap, the defeat of Rana Pratap | in 1757 - Battle of Plassey: between British and Sirajuddaulah, which British triumphed and the foundation of British rule in Indiawas | 1760 - Wandiwas the war : between the British and Fransisio, which has lost Fransisio | 1761 - Third Battle of Panipat: Ahmed Shah Abdali and the Mratho | which the French were defeated | 1764 - Battle of Buxar: British and Shujauddula, the combined forces of Mir Qasim and Shah Alam II | British prevailed | British regarded as the supreme power in India | from 1,767 to 69 - First Mysore War: Hyder Ali and among the British, which the British were defeated | 1780-84 - Second Mysore War: between Hyder Ali and the British, who left unsettled | 1790 - Third Anglo-Mysore War: The battle between Tipu Sultan and the British ended by the Treaty | 1799 - Fourth Anglo-Mysore War: Tipu Sultan and the British, Tipu's defeat and collapse of power Mysore | 1849 - chilean the war: the East India Company and was among the Sikhs which Sikhs were defeated | 1962 - Sino-Indian border युद्ध : चीनी सेना द्वारा भारत के सीमा क्षेत्रो पर आक्रमण | कुछ दिन तक युद्ध होने के बाद एकपक्षीय युद्ध विराम की घोषणा | भारत को अपनी सीमा के कुछ हिस्सों को छोड़ना पड़ा | १९६५ – भारत पाक युद्ध : भारत और पाकिस्तान के बीच युद्ध जिसमे पाकिस्तान की हार हुई | फलस्वरूप बांग्लादेश एक स्वतन्त्र देश बना | १९९९ -कारगिल युद्ध : जम्मू एवं कश्मीर के द्रास और कारगिल क्षेत्रो में पाकिस्तानी घुसपैठियों को लेकर हुए युद्ध में पुनः पाकिस्तान को हार का सामना करना पड़ा और भारतीयों को जीत मिली |    

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भारतीय इतिहास के प्रमुख युद्ध
ई.पू.
३२६ हाईडेस्पीज का युद्ध : सिकंदर और पंजाब के राजा पोरस के बीच जिसमे सिकंदर की विजय हुई |
२६१ कलिंग की लड़ाई : सम्राट अशोक ने कलिंग पर आक्रमण किया था और युद्ध के रक्तपात से विचलित होकर उन्होंने युद्ध न करने की कसम खाई |
ईस्वी
७१२ – सिंध की लड़ाई में मोहम्मद कासिम ने अरबों की सत्ता स्थापित की |
११९१ – तराईन का प्रथम युद्ध – मोहम्मद गौरी और पृथ्वी राज चौहान के बीच हुआ था | चौहान की विजय हुई |
११९२ -तराईन का द्वितीय युद्ध – मोहम्मद गौरी और पृथ्वी राज चौहान के बीच| इसमें मोहम्मद गौरी की विजय हुई |
११९४ -चंदावर का युद्ध – इसमें मुहम्मद गौरी ने कन्नौज के राजा जयचंद को हराया |
१५२६ -पानीपत का प्रथम युद्ध -मुग़ल शासक बाबर और इब्राहीम लोधी के बीच |
१५२७ -खानवा का युद्ध – इसमें बाबर ने राणा सांगा को पराजित किया |
१५२९ -घाघरा का युद्ध -इसमें बाबर ने महमूद लोदी के नेतृत्व में अफगानों को हराया |
१५३९ – चौसा का युद्ध – इसमें शेरशाह सूरी ने हुमायु को हराया |
१५४० – कन्नौज (बिलग्राम का युद्ध) : इसमें फिर से शेरशाह सूरी ने हुमायूँ को हराया व भारत छोड़ने पर मजबूर किया |
१५५६ – पानीपत का द्वितीय युद्ध :अकबर और हेमू के बीच |
१५६५ – तालीकोटा का युद्ध : इस युद्ध से विजयनगर साम्राज्य का अंत हो गया क्यूंकि बीजापुर, बीदर,अहमदनगर व गोलकुंडा की संगठित सेना ने लड़ी थी |
१५७६ – हल्दी घाटी का युद्ध : अकबर और राणा प्रताप के बीच, इसमें राणा प्रताप की हार हुई |
१७५७ – प्लासी का युद्ध : अंग्रेजो और सिराजुद्दौला के बीच, जिसमे अंग्रेजो की विजय हुई और भारत में अंग्रेजी शासन की नीव पड़ी |
१७६० – वांडीवाश का युद्ध : अंग्रेजो और फ्रांसीसियो के बीच, जिसमे फ्रांसीसियो की हार हुई |
१७६१ -पानीपत का तृतीय युद्ध :अहमदशाह अब्दाली और मराठो के बीच | जिसमे फ्रांसीसियों की हार हुई |
१७६४ -बक्सर का युद्ध : अंग्रेजो और शुजाउद्दौला, मीर कासिम एवं शाह आलम द्वितीय की संयुक्त सेना के बीच | अंग्रेजो की विजय हुई | अंग्रेजो को भारत वर्ष में सर्वोच्च शक्ति माना जाने लगा |
१७६७-६९ – प्रथम मैसूर युद्ध : हैदर अली और अंग्रेजो के बीच, जिसमे अंग्रेजो की हार हुई |
१७८०-८४ – द्वितीय मैसूर युद्ध : हैदर अली और अंग्रेजो के बीच, जो अनिर्णित छूटा |
१७९० – तृतीय आंग्ल मैसूर युद्ध : टीपू सुल्तान और अंग्रेजो के बीच लड़ाई संधि के द्वारा समाप्त हुई |
१७९९ – चतुर्थ आंग्ल मैसूर युद्ध : टीपू सुल्तान और अंग्रेजो के बीच , टीपू की हार हुई और मैसूर शक्ति का पतन हुआ |
१८४९ – चिलियान वाला युद्ध : ईस्ट इंडिया कंपनी और सिखों के बीच हुआ था जिसमे सिखों की हार हुई |
१९६२ – भारत चीन सीमा युद्ध : चीनी सेना द्वारा भारत के सीमा क्षेत्रो पर आक्रमण | कुछ दिन तक युद्ध होने के बाद एकपक्षीय युद्ध विराम की घोषणा | भारत को अपनी सीमा के कुछ हिस्सों को छोड़ना पड़ा |
१९६५ – भारत पाक युद्ध : भारत और पाकिस्तान के बीच युद्ध जिसमे पाकिस्तान की हार हुई | फलस्वरूप बांग्लादेश एक स्वतन्त्र देश बना |
१९९९ -कारगिल युद्ध : जम्मू एवं कश्मीर के द्रास और कारगिल क्षेत्रो में पाकिस्तानी घुसपैठियों को लेकर हुए युद्ध में पुनः पाकिस्तान को हार का सामना करना पड़ा और भारतीयों को जीत मिली |

गुरुवार, 15 दिसंबर 2016

War of history,GK Questions Answers, General Knowledge Question Answer

भारतीय इतिहास के प्रमुख युद्ध कब और किसके बीच हुए 

GK Questions Answers

समय         युद्ध का नाम          किस-किस के बीच हुए

326        हाईडेस्पीज का युद्ध     सिकंदर और पंजाब के राजा पोरस के बीच जिसमे सिकंदर की विजय हुई।

261       कलिंग की लड़ाई         सम्राट अशोक ने कलिंग पर आक्रमण किया था और युद्ध के रक्तपात से 
विचलित होकर उन्होंने युद्ध न करने की कसम खाई

712        सिंध की लड़ाई           मोहम्मद कासिम ने अरबों की सत्ता स्थापित की।

1191       तराईन का प्रथम युद्ध     मोहम्मद गौरी और पृथ्वी राज चौहान के बीच हुआ था। चौहान की विजय हुई।

1192       तराईन का द्वितीय युद्ध  मोहम्मद गौरी और पृथ्वी राज चौहान के बीच| इसमें मोहम्मद गौरी की विजय हुई।       General Knowledge Question Answer

1194       चंदावर का युद्ध              इसमें मुहम्मद गौरी ने कन्नौज के राजा जयचंद को हराया।

1526       पानीपत का प्रथम युद्ध      मुग़ल शासक बाबर और इब्राहीम लोधी के बीच।

1527        खानवा का युद्ध            इसमें बाबर ने राणा सांगा को पराजित किया।

1529       घाघरा का युद्ध              इसमें बाबर ने महमूद लोदी के नेतृत्व में अफगानों को हराया।

1531         चौसा का युद्ध             इसमें शेरशाह सूरी ने हुमायु को हराया।

1540 कन्नौज (बिलग्राम का युद्ध) इसमें फिर से शेरशाह सूरी ने हुमायूँ को हराया व भारत छोड़ने पर मजबूर किया।

1556        पानीपत का द्वितीय युद्ध                 अकबर और हेमू के बीच।

1565        तालीकोटा का युद्ध            इस युद्ध से विजयनगर साम्राज्य का अंत हो गया क्यूंकि बीजापुर, बीदर,अहमदनगर व गोलकुंडा की संगठित सेना ने लड़ी थी।

1676        हल्दी घाटी का युद्ध             अकबर और राणा प्रताप के बीच, इसमें राणा प्रताप की हार हुई।

1757         प्लासी का युद्ध        अंग्रेजो और सिराजुद्दौला के बीच, जिसमे अंग्रेजो की विजय हुई और भारत में अंग्रेजी शासन की नीव पड़ी।

1760       वांडीवाश का युद्ध       अंग्रेजो और फ्रांसीसियो के बीच, जिसमे फ्रांसीसियो की हार हुई।

1761       पानीपत का तृतीय युद्ध    अहमदशाह अब्दाली और मराठो के बीच। जिसमे फ्रांसीसियों की हार हुई।

1764         बक्सर का युद्ध         अंग्रेजो और शुजाउद्दौला, मीर कासिम एवं शाह आलम द्वितीय की संयुक्त सेना के बीच। अंग्रेजो की विजय हुई। अंग्रेजो को भारत वर्ष में सर्वोच्च शक्ति माना जाने लगा।

1767-69       प्रथम मैसूर युद्ध        हैदर अली और अंग्रेजो के बीच, जिसमे अंग्रेजो की हार हुई।

1780-84       द्वितीय मैसूर युद्ध      हैदर अली और अंग्रेजो के बीच, जो अनिर्णित छूटा।

1790          तृतीय आंग्ल मैसूर युद्ध     टीपू सुल्तान और अंग्रेजो के बीच लड़ाई संधि के द्वारा समाप्त हुई।

1799            चतुर्थ आंग्ल मैसूर युद्ध       टीपू सुल्तान और अंग्रेजो के बीच , टीपू की हार हुई और मैसूर शक्ति का पतन हुआ।

1849         चिलियान वाला युद्ध         ईस्ट इंडिया कंपनी और सिखों के बीच हुआ था जिसमे सिखों की हार हुई।

1962        भारत चीन सीमा युद्ध          चीनी सेना द्वारा भारत के सीमा क्षेत्रो पर आक्रमण। कुछ दिन तक युद्ध होने के बाद एकपक्षीय युद्ध विराम की घोषणा। भारत को अपनी सीमा के कुछ हिस्सों को छोड़ना पड़ा।

1964          भारत पाक युद्ध               भारत और पाकिस्तान के बीच युद्ध जिसमे पाकिस्तान की हार हुई। फलस्वरूप बांग्लादेश एक स्वतन्त्र देश बना।

1999        कारगिल युद्ध           जम्मू एवं कश्मीर के द्रास और कारगिल क्षेत्रो में पाकिस्तानी घुसपैठियों को लेकर हुए युद्ध में पुनः पाकिस्तान को हार का सामना करना पड़ा और भारतीयों को जीत मिली।

रविवार, 20 मार्च 2016

बक्सर का युद्ध

बक्सर का युद्ध   


बक्सर का युद्ध 1763 ई. से ही आरम्भ हो चुका था, किन्तु मुख्य रूप से यह युद्ध 22 अक्तूबर, सन् 1764 ई. में लड़ा गया। ईस्ट इण्डिया कम्पनी तथा बंगाल के नवाब मीर क़ासिम के मध्य कई झड़पें हुईं, जिनमें मीर कासिम पराजित हुआ। फलस्वरूप वह भागकर अवध आ गया और शरण ली। मीर कासिम ने यहाँ के नवाब शुजाउद्दौला और मुग़ल सम्राट शाह आलम द्वितीय के सहयोग से अंग्रेज़ों को बंगाल से बाहर निकालने की योजना बनायी, किन्तु वह इस कार्य में सफल नहीं हो सका। अपने कुछ सहयोगियों की गद्दारी के कारण वह यह युद्ध हार गया।


 अंग्रेज़ों की कूटनीति 

इस युद्ध में एक ओर मुग़ल सम्राट शाह आलम द्वितीय, अवध का नवाब शुजाउद्दौला तथा मीर क़ासिम थे, दूसरी ओर अंग्रेज़ी सेना का नेतृत्व उनका कुशल सेनापति 'कैप्टन मुनरो' कर रहा था। दोनों सेनायें बिहार में बलिया से लगभग 40 किमी. दूर 'बक्सर' नामक स्थान पर आमने-सामने आ पहुँचीं। 22 अक्टूबर, 1764 को 'बक्सर का युद्ध' प्रारम्भ हुआ, किन्तु युद्ध प्रारम्भ होने से पूर्व ही अंग्रेज़ों ने अवध के नवाब की सेना से 'असद ख़ाँ', 'साहूमल' (रोहतास का सूबेदार) और जैनुल अबादीन को धन का लालच देकर अलग कर दिया। लगभग तीन घन्टे में ही युद्ध का निर्णय हो गया, जिसकी बाज़ी अंग्रेज़ों के हाथ में रही। शाह आलम द्विताय तुरंत अंग्रेज़ी दल से जा मिला और अंग्रेज़ों के साथ सन्धि कर ली। मीर क़ासिम भाग गया तथा घूमता-फिरता ज़िन्दगी काटता रहा। दिल्ली के समीप 1777 ई. में अज्ञात अवस्था में उसकी मृत्यु हो गई। 

भारतीय दासता की शुरुआत 

ऐसा माना जाता है कि, बक्सर के युद्ध का सैनिक एवं राजनीतिक महत्व प्लासी के युद्ध से अधिक है। मुग़ल सम्राट शाह आलम द्वितीय, बंगाल का नवाब मीर क़ासिम एवं अवध का नवाब शुजाउद्दौला, तीनों अब पूर्ण रूप से कठपुतली शासक हो गये थे। उन्हें अंग्रेज़ी सेना के समक्ष अपने बौनेपन का अहसास हो गया था। थोड़ा बहुत विरोध का स्वर मराठों और सिक्खों मे सुनाई दिया, किन्तु वह भी समाप्त हो गया। निःसन्देह इस युद्ध ने भारतीयों की हथेली पर दासता शब्द लिख दिया, जिसे स्वतन्त्रता प्राप्त करने के बाद ही मिटाया जा सका। पी.ई. राबर्ट ने बक्सर के युद्ध के बारे में कहा है कि- "प्लासी की अपेक्षा बक्सर को भारत में अंग्रेज़ी प्रभुता की जन्मभूमि मानना कहीं अधिक उपयुक्त है"। 

सन्धि 

मीर क़ासिम को नवाब के पद से हटाकर एक बार पुनः मीर जाफ़र को अंग्रेज़ों ने बंगाल का नवाब बनाया। 5 फ़रवरी, 1765 ई. को मीर जाफ़र की मृत्यु हो गई। उसकी मृत्यु के बाद कम्पनी ने उसके अयोग्य पुत्र नजमुद्दौला को बंगाल का नवाब बनाकर फ़रवरी, 1765 ई. में उससे एक सन्धि कर ली। सन्धि की शर्तों के अनुसार रक्षा व्यवस्था, सेना, वित्तीय मामले, वाह्य सम्बन्धों पर नियंत्रण आदि को अंग्रेज़ों अपने अधिकार में कर लिया तथा बदले में नवाब को 53 लाख रुपये वार्षिक पेंशन देने का वादा किया। अंग्रेज़ संरक्षण प्राप्त बंगाल का प्रथम नवाब नजमुद्दौला था, तथा बंगाल का अन्तिम नवाब मुबारकउद्दौला (1770-1775 ई.) था।

































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बुधवार, 16 मार्च 2016

दूसरा विश्व युद्ध


दूसरा विश्व युद्ध

दूसरा विश्व युद्ध १९३९ से १९४५ तक चलने वाला विश्व-स्तरीय युद्ध था। लगभग ७० देशों की थल-जल-वायु सेनाएँ इस युद्ध में सम्मलित थीं। इस युद्ध में विश्व दो भागों मे बँटा हुआ था - मित्र राष्ट्र और धुरी राष्ट्र। इस युद्ध के दौरान पूर्ण युद्ध का मनोभाव प्रचलन में आया क्योंकि इस युद्ध में लिप्त सारी महाशक्तियों ने अपनी आर्थिक, औद्योगिक तथा वैज्ञानिक क्षमता इस युद्ध में झोंक दी थी। इस युद्ध में विभिन्न राष्ट्रों के लगभग १० करोड़ सैनिकों ने हिस्सा लिया, तथा यह मानव इतिहास का सबसे ज़्यादा घातक युद्ध साबित हुआ। इस महायुद्ध में ५ से ७ करोड़ व्यक्तियों की जानें गईं क्योंकि इसके महत्वपूर्ण घटनाक्रम में असैनिक नागरिकों का नरसंहार- जिसमें होलोकॉस्ट भी शामिल है- तथा परमाणु हथियारों का एकमात्र इस्तेमाल शामिल है (जिसकी वजह से युद्ध के अंत मे मित्र राष्ट्रों की जीत हुई)। इसी कारण यह मानव इतिहास का सबसे भयंकर युद्ध था।


हालांकि जापान चीन से सन् १९३७ ई. से युद्ध की अवस्था में था किन्तु अमूमन दूसरे विश्व युद्ध की शुरुआत ०१ सितम्बर १९३९ में जानी जाती है जब जर्मनी ने पोलैंड पर हमला बोला और उसके बाद जब फ्रांस ने जर्मनी पर युद्ध की घोषणा कर दी तथा इंग्लैंड और अन्य राष्ट्रमंडल देशों ने भी इसका अनुमोदन किया।
जर्मनी ने १९३९ में यूरोप में एक बड़ा साम्राज्य बनाने के उद्देश्य से पोलैंड पर हमला बोल दिया। १९३९ के अंत से १९४१ की शुरुआत तक, अभियान तथा संधि की एक शृंखला में जर्मनी ने महाद्वीपीय यूरोप का बड़ा भाग या तो अपने अधीन कर लिया था या उसे जीत लिया था। नाट्सी-सोवियत समझौते के तहत सोवियत रूस अपने छः पड़ोसी मुल्कों, जिसमें पोलैंड भी शामिल था, पर क़ाबिज़ हो गया। फ़्रांस की हार के बाद युनाइटेड किंगडम और अन्य राष्ट्रमंडल देश ही धुरी राष्ट्रों से संघर्ष कर रहे थे, जिसमें उत्तरी अफ़्रीका की लड़ाइयाँ तथा लम्बी चली अटलांटिक की लड़ाई शामिल थे। जून १९४१ में युरोपीय धुरी राष्ट्रों ने सोवियत संघ पर हमला बोल दिया और इसने मानव इतिहास में ज़मीनी युद्ध के सबसे बड़े रणक्षेत्र को जन्म दिया। दिसंबर १९४१ को जापानी साम्राज्य भी धुरी राष्ट्रों की तरफ़ से इस युद्ध में कूद गया। दरअसल जापान का उद्देश्य पूर्वी एशिया तथा इंडोचायना में अपना प्रभुत्व स्थापित करने का था। उसने प्रशान्त महासागर में युरोपीय देशों के आधिपत्य वाले क्षेत्रों तथा संयुक्त राज्य अमेरीका के पर्ल हार्बर पर हमला बोल दिया और जल्द ही पश्चिमी प्रशान्त पर क़ब्ज़ा बना लिया।
सन् १९४२ में आगे बढ़ती धुरी सेना पर लगाम तब लगी जब पहले तो जापान सिलसिलेवार कई नौसैनिक झड़पें हारा, युरोपीय धुरी ताकतें उत्तरी अफ़्रीका में हारीं और निर्णायक मोड़ तब आया जब उनको स्तालिनग्राड में हार का मुँह देखना पड़ा। सन् १९४३ में जर्मनी पूर्वी युरोप में कई झड़पें हारा, इटली में मित्र राष्ट्रों ने आक्रमण बोल दिया तथा अमेरिका ने प्रशान्त महासागर में जीत दर्ज करनी शुरु कर दी जिसके कारणवश धुरी राष्ट्रों को सारे मोर्चों पर सामरिक दृश्टि से पीछे हटने की रणनीति अपनाने को मजबूर होना पड़ा। सन् १९४४ में जहाँ एक ओर पश्चिमी मित्र देशों ने जर्मनी द्वारा क़ब्ज़ा किए हुए फ़्रांस पर आक्रमण किया वहीं दूसरी ओर से सोवियत संघ ने अपनी खोई हुयी ज़मीन वापस छीनने के बाद जर्मनी तथा उसके सहयोगी राष्ट्रों पर हमला बोल दिया। सन् १९४५ के अप्रैल-मई में सोवियत और पोलैंड की सेनाओं ने बर्लिन पर क़ब्ज़ा कर लिया और युरोप में दूसरे विश्वयुद्ध का अन्त ८ मई १९४५ को तब हुआ जब जर्मनी ने बिना शर्त आत्मसमर्पण कर दिया।
सन् १९४४ और १९४५ के दौरान अमेरिका ने कई जगहों पर जापानी नौसेना को शिकस्त दी और पश्चिमी प्रशान्त के कई द्वीपों में अपना क़ब्ज़ा बना लिया। जब जापानी द्वीपसमूह पर आक्रमण करने का समय क़रीब आया तो अमेरिका ने जापान में दो परमाणु बम गिरा दिये। १५ अगस्त १९४५ को एशिया में भी दूसरा विश्वयुद्ध समाप्त हो गया जब जापानी साम्राज्य ने आत्मसमर्पण करना स्वीकार कर लिया।

पृष्ठभूमि

पहले विश्वयुद्ध में हार के बाद जर्मनी को वर्साय की संधि पर जबरन हस्ताक्षर करना पड़ा। इस संधि के कारण उसे अपने कब्ज़े की बहुत सारी ज़मीन छोडनी पड़ी, किसी दूसरे देश पर आक्रमण नहीं करने की शर्त माननी पड़ी, अपनी सेना को सीमित करना पड़ा और उसको पहले विश्व युद्ध में हुए नुकसान की भरपाई के रूप में दूसरे देशों को भुगतान करना पड़ा।
१९१७ में रूस में गृह युद्ध के बाद सोवियत संघ का निर्माण हुआ जो की जोसफ स्तालिन के शासन में था, १९२२ में उसी समय इटली में बेनितो मुसोलिनी का एकाधिपत्य राज्य कायम हुआ।
१९३३ में जर्मनी का शासक एडोल्फ हिटलर बना और तुंरत ही उसने जर्मनी को वापस एक शक्तिशाली सैन्य ताकत के रूप में प्रर्दशित करना शुरू कर दिया। इस बात से फ्रांस और इंग्लैंड चिंतित हो गए जो की पिछली लड़ाई में काफ़ी नुक़सान उठा चुके थे। इटली भी इस बात से परेशान था क्योंकि उसे भी लगता था की जर्मनी उसके काम में दख़ल देगा क्योंकि उसका सपना भी शक्तिशाली सैन्य ताकत बनने का था।
इन सब बातों को देखकर और अपने आप को बचाने के लिए फ्रांस ने इटली के साथ हाथ मिलाया और उसने अफ्रीका में इथियोपिया- जो उसके कब्ज़े में था- को इटली को देने का मन बना लिया। १९३५ में बात और बिगड़ गई जब हिटलर ने वर्साय की संधि को तोड़ दिया और अपनी सेना को बड़ा करने का काम शुरू कर दिया।
जर्मनी को काबू में करने के लिए इंग्लैंड, फ्रांस और इटली ने स्ट्रेसा नामक शहर (जो इटली में है) में एक घोषणा-पत्र पर हस्ताक्षर किए जिसमें यह लिखा था की ऑस्ट्रिया की आज़ादी को कायम रखा जाए और जर्मनी को वर्साय की संधि तोड़ने से रोका जाए। लेकिन स्ट्रेसा घोषणा-पत्र ज्यादा सफल नहीं हुआ क्योंकि तीनों राज्यों के बीच में आम सहमती ज़्यादातर बातों पर नहीं बनी। उसी समय सोविएत संघ जो जर्मनी के पूर्वी यूरोप के बड़े हिस्से को कब्जा करने की मंशा से डरा हुआ था, फ्रांस से हाथ मिलाने को तैयार हो गया।
जर्मन सेना १९३५ में नुरेम्बेर्ग में १९३५ में इंग्लैंड ने वर्साय की संधि को दरकिनार करते हुए जर्मनी के साथ एक स्वतंत्र करार करके कुछ पुरानी शर्तों को कम कर दिया। १९३५ की अक्टूबर में इटली ने इथियोपिया पर आक्रमण कर दिया और सिर्फ़ जर्मनी ने इस आक्रमण को वैध माना जिसके कारण इटली ने जर्मनी को आस्ट्रिया पर कब्जा करने के मंशा को हरी झंडी दे दी। १९३६ में जब हिटलर ने रयानलैंड को दोबारा अपनी सेना का गड बाने की कोशिश की तो उस पर ज्यादा आपत्तियां नही उठाई गई . उसी साल स्पेन में ग्रह युद्ध चालू हुआ तो जर्मनी और इटली ने वहां की राष्ट्रवादी ताकत का समर्थन किया जो सोविएत संघ की सहायता वाली स्पेनिश गणराज्य के खिलाफ थी। नए हथियारों के परिक्षण के बीच में राष्ट्रवादी ताकतों ने 1939 में युद्ध जीत लिया .
जैसे जैसे समय बीतता गया तनाव बढता रहा और अपने आप को ताकतवर करने की कोशिशें बढती गई। तभी जर्मनी और इटली ने रोम-बर्लिन समझौता अंग्रेज़ी: (ROME - BERLIN AXIS) किया और फिर जर्मनी ने जापान के साथ मिलकर साम्यवाद विरोधि करार अंग्रेज़ी: (anti comintern pact) किया जो चीन और सोविएत संघ के खिलाफ मिलकर काम करने के लिये था और इटली भी इसमे १९४० में शामिल हो गया।
युद्ध की शुरुवात
1937 में चीन और जापान मार्को पोलों में आपस में लड़ रहे थे। उसी के बाद जापान ने चीन पर पर पूरी तरह से धावा बोल दिया। सोविएत संघ ने चीन तो अपना पूरा समर्थन दिया. लेकिन जापान सेना ने शंघाई से चीन की सेना को हराने शुरू किया और उनकी राजधानी बेजिंग पर कब्जा कर लिया। 1938 ने चीन ने अपनी पीली नदी तो बाड़ ग्रस्त कर दिया और चीन को थोड़ा समय मिल गया सँभालने ने का लेकिन फिर भी वो जापान को रोक नही पाये। इसे बीच सोविएत संघ और जापान के बीच में छोटा युध हुआ पर वो लोग अपनी सीमा पर ज्यादा व्यस्त हो गए।
यूरोप में जर्मनी और इटली और ताकतवर होते जा रहे थे और 1938 में जर्मनी ने आस्ट्रिया पर हमला बोल दिया फिर भी दुसरे यूरोपीय देशों ने इसका ज़्यादा विरोध नही किया। इस बात से उत्साहित होकर हिटलर ने सदेतेनलैंड जो की चेकोस्लोवाकिया का पश्चिमी हिस्सा है और जहाँ जर्मन भाषा बोलने वालों की ज्यादा तादात थी वहां पर हमला बोल दिया। फ्रांस और इंग्लैंड ने इस बात को हलके से लिया और जर्मनी से कहाँ की जर्मनी उनसे वादा करे की वो अब कहीं और हमला नही करेगा। लेकिन जर्मनी ने इस वादे को नही निभाया और उसने हंगरी से साथ मिलकर 1939 में पूरे चेकोस्लोवाकिया पर कब्जा कर लिया।
दंजिग शहर जो की पहले विश्वयुद्ध के बाद जर्मनी से अलग करके पोलैंड को दे दिया गया था और इसका संचालन देशों का संघ (अंग्रेज़ी: league of nations) (लीग ऑफ़ नेशन्स) नामक विश्वस्तरीय संस्था कर रही थी, जो की प्रथम विश्व युद्ध के बाद स्थापित हुए थी। इस देंजिंग शहर पर जब हिटलर ने कब्जा करने की सोची तो फ्रांस और जर्मनी पोलैंड को अपनी आजादी के लिए समर्थन देने को तैयार हो गए। और जब इटली ने अल्बानिया पर हमला बोला तो यही समर्थन रोमानिया और ग्रीस को भी दिया गया। सोविएत संघ ने भी फ्रांस और इंग्लैंड के साथ हाथ मिलाने की कोशिश की लेकिन पश्चिमी देशों ने उसका साथ लेने से इंकार कर दिया क्योंकि उनको सोविएत संघ की मंशा और उसकी क्षमता पर शक था। फ्रांस और इंग्लैंड की पोलैंड को सहायता के बाद इटली और जर्मनी ने भी समझौता पैक्ट ऑफ़ स्टील किया की वो पूरी तरह एक दूसरे के साथ है।
सोविएत संघ यह समझ गया था की फ्रांस और इंग्लैंड को उसका साथ पसंद नही और जर्मनी अगर उस पर हमला करेगा तो भी फ्रांस और इंग्लैंड उस के साथ नही होंगे तो उसने जर्मनी के साथ मिलकर उसपर आक्रमण न करने का समझौता (नॉन अग्ग्रेग्र्सन पैक्ट) पर हस्ताक्षर किए और खुफिया तौर पर पोलैंड और बाकि पूर्वी यूरोप को आपस में बाटने का ही करार शामिल था।
सितम्बर 1939 में सोविएत संघ ने जापान को अपनी सीमा से खदेड़ दिया और उसी समय जर्मनी ने पोलैंड पर हमला बोल दिया। फ्रांस, इंग्लैंड और राष्ट्रमण्डल देशों ने भी जर्मनी के खिलाफ हमला बोल दिया परन्तु यह हमला बहुत बड़े पैमाने पर नही था सिर्फ़ फ्रांस ने एक छोटा हमला सारलैण्ड पर किया जो की जर्मनी का एक राज्य था। सोविएत संघ के जापान के साथ युद्धविराम के घोषणा के बाद ख़ुद ही पोलैंड पर हमला बोल दिया। अक्टूबर 1939 तक पोलैंड जर्मनी और सोविएत संघ के बीच विभाजित हो चुका था। इसी दौरान जापान ने चीन के एक महत्वपूर्ण शहर चंघसा पर आक्रमण कर दिया पर चीन ने उन्हें बहार खड़ेड दिया। पोलैंड पर हमले के बाद सोविएत संघ ने अपनी सेना को बाल्टिक देशों (लातविया, एस्टोनिया, लिथुँनिया) की तरफ मोड़ दी। नवम्बर 1939 में फिनलैंड पर जब सोविएत संघ ने हमला बोला तो युद्ध जो विंटर वार के नाम से जाना जाता है वो चार महीने चला और फिनलैंड को अपनी थोडी सी जमीन खोनी पड़ी और उसने सोविएत संघ के साथ मॉस्को शान्ति करार पर हस्ताक्षर किए जिसके तहत उसकी आज़ादी को नही छीना जाएगा पर उस सोविएत संघ के कब्जे वाली फिनलैंड की ज़मीन को छोड़ना पड़ेगा जिसमे फिनलैंड की 12 प्रतिशत जन्शंख्या रहती थी और उसका दूसरा बड़ा शहर य्वोर्ग शामिल था।
फ्रांस और इंग्लैंड ने सोविएत संघ के फिनलैंड पर हमले को द्वितीय विश्व युद्ध में शामिल होने का बहाना बनाया और जर्मनी के साथ मिल गए और सोविएत संघ को देशों के संघ (लीग ऑफ़ नेशन्स) से बहार करने की कोशिश की। चीन के पास कोशिश को रोकने का मौक था क्योकि वो देशों के संघ (लीग ऑफ़ नेशन्स) का सदस्य था। लेकिन वो इस प्रस्ताव में शामिल नही हुआ क्योंकि न तो वो सोविएत संघ से और न ही पश्चिमी ताकतों से अपने आप को दूर रखना चाहता था। सोविएत संघ इस बात से नाराज़ हो गया और चीन को मिलने वाली सारी सैनिक मदद को रोक दिया। जून 1940 में सोविएत संघ ने तीनों बाल्टिक देशों पर कब्जा कर लिया।





















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