सोमवार, 11 अप्रैल 2016

Gk of History



कुव्वत - उल - इस्लाम मस्जिद - कुतुबुद्दीन ऐबक द्वारा बनवाई गई यह मस्जिद भारत में तुर्क शासक द्वारा बनवाई गई पहली मस्जिद थी। इसका निर्माण 1119 ई. में दिल्ली विजय की स्मृति में दिल्ली के निकट महरौली में कराया था। इसके निर्माण सामग्री में हिन्दू मंदिरों अवशेषों का प्रयोग किया गया था। यह मस्जिद इण्डो - इस्लामिक शैली में निर्मित है जिसमें हिन्दू प्रभाव स्पष्ट रुप से प्रदर्शित होता है। इल्तुतमिस तथा अलाउद्दीन खिलजी ने भी इस मस्जिद का विस्तार किया था।

अढाई दिन का झोपडा - राजस्थान के अजमेर में स्थित यह मस्जिद प्रारंभ में एक संस्कृत विद्यालय था जिसे विग्रहराज ने बनवाया था बाद में जिसे कुतुबुद्दीन ऐबक ने तुड़वाकर मस्जिद में परिवर्तित कर दिया। ऐसी माना जाता है कि इसका निर्माण कार्य ढाई दिन में किया गया था इसलिए इसे अढाई दिन का झोपड़ा कहा जाता है। यहां पर प्रत्येक ढाई वर्षों में एक मेला भी लगता हैं।
कुतुबमीनार - कुतुबुद्दीन ऐबक द्वारा दिल्ली से कुछ दूरी पर महारौली नामक स्थान पर इस मीनार का निर्माण प्रारंभ कराया गया था। कुतुबुद्दीन ऐबक ने इसका निर्माण शेख ख्वाजा कुतुबुद्दीन बख्तियार काकी की याद में शुरू करवाया था। ऐबक इस मीनार की एक मंजिल का निर्माण ही करवा पाया था बाकी का निर्माण इल्तुतमिस ने पूर्ण कराया। फिरोज तुगलक के समय इस पर बिजली गिरने की वजह से उसने चौथी मंजिल तोड़कर वहां दो और मंजिलें बनवा दी । सिकंदर लोदी ने भी कुतुबमीनार की मरम्मत करवाया था। इस मीनार के आधार का व्यास 46 फीट तथा शिखर का व्यास 10 फीट है और इसकी ऊँचाई लगभग 237 फीट है। इस मीनार में लगभग 379 सीढ़ियां है।विश्व धरोहर में शामिल कुतुबमीनार के निर्माण में लाल बलुआ पत्थरों का सर्वाधिक उपयोग किया गया है यह ईटों से बनी विश्व की सर्वाधिक ऊँची मीनार है।
नासिरुद्दीन महमूद का मकबरा या सुल्तानगढी - इस मकबरे का निर्माण इल्तुतमिस ने अपने पुत्र नासिरुद्दीन की याद में करवाया था। इसका निर्माण 1231- 32 ई. में मलकापुर में कराया गया था। यह तुर्कों द्वारा निर्मित भारत में पहला मकबरा था। इस मकबरे के चारदीवारी के बीच में लगभग 66 फुट का आंगन है एवं इसके चारों ओर दुर्ग जैसा घेराव है।
इल्तुतमिस का मकबरा - इस मकबरे का निर्माण इल्तुतमिस ने लगभग 1235 ई. में करवाया था। इस मकबरे की आंतरिक दीवारों फर्स एवं छत पर कुरान की आयते खुदी हुई है। इस 42 फुट वर्गाकार इस इस इमारत के तीन ओर से दरवाजे बने हुए हैं। इल्तुतमिस द्वारा कुछ अन्य इमारतें भी बनवाई गई जिसमें हौज़- ए - शम्सी , शम्सी ईदगाह एवं जामा मस्जिद प्रमुख हैं।


मोइनुद्दीन चिश्ती की दरगाह - इस दरगाह का निर्माण इल्तुतमिस ने करवाया था जिसका विस्तार बाद में अलाउद्दीन खिलजी ने करवाया।
अलाई दरवाजा - अलाउद्दीन खिलजी ने इसका निर्माण 1310-11 ई. में करवाया था। अलाई दरवाजा कुव्वत - उल - इस्लाम मस्जिद के प्रवेश द्वार के रुप में बनवाया गया था। यह अलाउद्दीन खिलजी द्वारा निर्मित सर्वश्रेष्ठ इमारत है। यह एक ऊंचे चबूतरे पर निर्मित एक चौकोर इमारत है । इस दरवाजे पर लाल पत्थर का प्रयोग किया गया है किन्तु कहीं - कहीं पर संगमरमर का भी प्रयोग किया गया है। इसमें कुरान की आयतों की सजावट बहुत आकर्षक तरीके से की गई है।
जमातखाना मस्जिद - अलाउद्दीन खिलजी ने इस मस्जिद का निर्माण निजामुद्दीन औलिया की दरगाह के पास में करवाया था। सल्तनत काल में बनी यह मस्जिद पूर्णतः इस्लामी शैली में निर्मित भारत की पहली मस्जिद है। इस मस्जिद के निर्माण में लाल पत्थर का प्रयोग किया गया है तथा इसमें तीन कमरे हैं।
अलाउद्दीन खिलजी द्वारा दिल्ली से कुछ दूरी पर सीरी नगर का निर्माण करवाया गया था एवं इस नगर में एक तालाब का निर्माण भी किया था जिसे हौज़ खास का तालाब कहा जाता है । इसी क्रम में दिल्ली स्थित हजार खंभा महल अलाउद्दीन खिलजी द्वारा निर्मित किया गया था।
निजामुद्दीन औलिया का मकबरा - इस मकबरे का निर्माण खिज्र खां ने करवाया था । इस मकबरे में संगमरमर का बहुत अच्छा प्रयोग किया है।
तुगलकाबाद - तुगलकाबाद नगर का निर्माण ग्यासुद्दीन तुगलक ने दिल्ली के समीप ऊंची पहाड़ियों पर करवाया था। इस नगर में एक दुर्ग का निर्माण किया गया जिसे छप्पन कोट कहा जाता है। इस नगर में प्रवेश के लिए 52 दरवाजे बनवाएँ गए थे।
ग्यासुद्दीन तुगलक का मकबरा - यह मकबरा मिस्र के पिरामिडों की तरह अन्दर की तरफ झुका हुआ है । इस मकबरे में हिन्दू मंदिर की शैली के अनुसार ऊपरी भाग में आमलक तथा कलश का प्रयोग किया गया है। मकबरे के ऊपरी भाग में संगमरमर का भी प्रयोग किया गया है। इसकी ऊँचाई लगभग 81 फीट है।
जहांपनाह नगर - मोहम्मद बिन तुगलक ने इस नगर का निर्माण सीरी और रायपिथौरा के बीच में करवाया था। मोहम्मद तुगलक ने इसका निर्माण इस प्रकार से कराया था कि बाहरी आक्रमण से यह सुरक्षित रहे इसके चारों तरफ 12 गज मोटी सुरक्षा दीवार बनाई गई थी एवं 13 दरवाजे थे । वर्तमान में यह खण्डहर रूप में है। इसके अवशेषों में सतपुत्र अर्थात सात मेहराबों का पुत्र और विजय मण्डल विद्यमान हैं।
आदिलशाह का किला - मोहम्मद बिन तुगलक द्वारा इस किले का निर्माण तुगलकाबाद के समीप ही करवाया गया था
बारहखंभा - तुगलक कालीन में बनवाई गई यह इमारत सामंत के निवास के लिए प्रयोग की जाती थी। यह इमारत तुगलक कालीन धर्मनिरपेक्ष इमारतों में विशिष्ट है। इसकी प्रमुख विशेषता यहाँ की सुरक्षा एवं गुप्त निवास है।
फिरोजशाह कोटला - फिरोजशाह तुगलक ने दिल्ली में एक नए नगर की स्थापना की जिसमें एक दुर्ग का निर्माण करवाया जिसे फिरोजशाह कोटला कहा जाता है। इसका क्षेत्रफल दिल्ली के शाहजहांबाद से दुगना था । इसके अन्दर भवनों, मस्जिद एवं राजमहलों का निर्माण किया गया । दुर्ग में दो मंजिला इमारत के अवशेष मिले हैं जो संभवतः विद्यालय के लिए प्रयोग होती होगी। फिरोजशाह तुगलक ने इसी दुर्ग में टोपरा से लाया गया एक अशोक स्तंभ को स्थापित करवाया था।
कुश्क - ए - शिकार - फिरोजशाह तुगलक द्वारा निर्मित यह भवन मुख्य रूप से शिकार से संबंधित था सुल्तान इसे शाहनुमा कहता था। इसके सामने ही मेरठ से लाया गया दूसरा अशोक स्तंभ स्थापित करवाया गया था।
फिरोजशाह तुगलक का मकबरा - यह वर्गाकार मकबरा संगमरमर और लाल पत्थर से निर्मित है। मकबरे का गुम्बद अष्टकोणीय ड्रम पर निर्मित है। इसका प्रमुख द्वार दक्षिण की तरफ है तथा इसकी मजबूत दीवारों को फूल पत्तियों एवं बेलो से सजाया गया था।
खान - ए - जहां तेलंगानी का मकबरा - अष्टभुजाकार में निर्मित यह मकबरा लाल पत्थर एवं सफेद संगमरमर से बना है। इसे खाने जहां जूनाशाह ने अपने पिता जो फिरोजशाह तुगलक के प्रधानमंत्री थे उनकी स्मृति में बनवाया था। इस मकबरे की तुलना जेरूसलम में निर्मित उमर मस्जिद से की जाती है।
तुगलक कालीन अन्य प्रमुख इमारतों में - खिड़की मस्जिद, काली मस्जिद, बेगमपुरी मस्जिद , कलां मस्जिद एवं कबिरुद्दीन औलिया का मकबरा इत्यादि प्रसिद्ध है।
मुबारक शाह सैय्यद का मकबरा - लाल पत्थरों से निर्मित यह अष्टभुजाकार इमारत मुबारकपुर गांव में स्थित है । इसका निर्माण अलाउद्दीन आलम ने करवाया था। सर जॉन मार्शल के अनुसार - " इस इमारत का मुख्य दोष यह है कि निर्माणकर्ताओ ने इसे इतना ऊंचा बना दिया है कि दर्शक की दृष्टि से ऊँचा है।"
मुबारक शाह का मकबरा - इस अष्टभुजीय मकबरे का निर्माण सामान्य ऊँचाई से किया गया तथा इसकी सजावट के लिए चीनी टाइलों का प्रयोग किया गया।
बहलोल लोदी का मकबरा - इस मकबरे का निर्माण सिकंदर लोदी ने 1418 ई. में करवाया था। लाल पत्थरों से निर्मित इस मकबरे में तीन मेहराब एवं पांच गुम्बद है बीच में स्थित गुम्बद की ऊँचाई सबसे अधिक है।
सिकंदर लोदी का मकबरा - इसका निर्माण इब्राहिम लोदी ने 1517 ई. में करवाया था। इसके गुम्बद के चारों ओर आठ खम्भे बने हुए हैं तथा चारों किनारों पर ऊँचे बुर्ज बने हैं। मुगल शैली के विकास में यह मकबरा प्रेरणा स्रोत रहा है।

मोठ की मस्जिद - सिकंदर लोदी के वजीर मियां भुआ ने इसका निर्माण करवाया था । यह लोदियों की स्थापत्य कला की सबसे सुंदर इमारत है।
लोदी काल में निर्मित बड़े खां तथा छोटे खां का मकबरा का निर्माण सिकंदर लोदी ने करवाया था । लोदी कालीन अन्य इमारतों में मोती मस्जिद, बड़ा गुम्बद , पीली का गुम्बद , शीश गुम्बद एवं ताज खां का गुम्बद आदि प्रसिद्ध हैं। पर्सी ब्राउन ने इस युग को ' मकबरों का युग ' के नाम से संबोधित किया है



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